IFS अवार्ड पर मंडराता खतरा

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बालोद पर्यावरण पार्क में भ्रष्टाचार का मामला अब एक बड़े प्रशासनिक संकट का रूप ले चुका है। तहलका पत्रिका की रिपोर्ट और पीएमओ (PMO) के कड़े रुख ने विभाग के भीतर खलबली मचा दी है।

“तहलका पत्रिका” की जांच व साक्ष्यों की गहराई को देखते हुए, वर्तमान में बालोद वन मंडल के उन अधिकारियों पर सबसे ज़्यादा गाज गिरती दिख रही है, जो इस प्रोजेक्ट की प्लानिंग और बजट अप्रूवल में सीधे तौर पर शामिल थे।

PMO का सख्त रुख और कार्यवाही के निर्देश:

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करते हुए सख्त कार्यवाही के निर्देश दिए हैं। उच्च स्तरीय संज्ञान लिए जाने के बाद अब संबंधित विभागों को जवाब देते नहीं बन रहा है। दिल्ली से आए कड़े तेवरों के बाद स्थानीय और राज्य स्तर के अधिकारियों पर दबाव काफी बढ़ गया है।

यहाँ उन विशिष्ट पहलुओं का विवरण है जिनकी जांच अब तेज़ी से आगे बढ़ रही है:

सूत्रों के अनुसार:
दस्तावेजों में हेराफेरी:

जांच से बचने के लिए कागजों और बिलों में बदलाव करने की कोशिशें की जा रही हैं।

तत्कालीन डीएफओ (DFO) एसडीओ (SDO) और रेंजर की भूमिका
जांच का मुख्य केंद्र तत्कालीन डीएफओ (Divisional Forest Officer) की कार्यशैली है। सूत्रों के अनुसार, प्रोजेक्ट के दौरान जिस तरह से फंड का डायवर्जन किया गया और कागजों पर काम दिखाया गया, उसमें बिना वरिष्ठ अधिकारियों की सहमति के ऐसा होना संभव नहीं था। यही कारण है कि कुछ अधिकारियों के IFS अवार्ड (पदोन्नति) की फाइलें अब अटक सकती हैं?

निर्माण कार्यों में “ओवर-बिलिंग”

तहलका पत्रिका और अन्य सूत्रों से जो जानकारी छनकर बाहर आई है, उसके अनुसार:
सामग्री की गुणवत्ता: पार्क में इस्तेमाल की गई सामग्री की गुणवत्ता बेहद खराब है, जबकि बिल उच्चतम दरों पर पास किए गए।

दस्तावेजों की “फोर्जिंग” (हेराफेरी)

विभागीय सूत्रों के अनुसार, PMO के सख्त निर्देशों के बाद विभाग के भीतर ‘बैक-डेट’ में दस्तावेज तैयार करने की कोशिश हुई है। लेकिन केंद्रीय एजेंसियों की निगरानी के कारण अब ऑडिट ट्रेल को मिटाना नामुमकिन साबित हो रहा है।

IFS अवार्ड पर मंडराता खतरा:

इस भ्रष्टाचार कांड की सबसे बड़ी गाज उन अधिकारियों पर गिर सकती है जो IFS (Indian Forest Service) अवार्ड के लिए कतार में थे। जांच की आंच की वजह से कई वरिष्ठ अधिकारियों के प्रमोशन और प्रतिष्ठित अवार्ड्स पर ग्रहण लग सकता है।

‘टॉप टू बॉटम’ कार्यवाही की तैयारी:

जांच के दायरे में केवल छोटे कर्मचारी ही नहीं, बल्कि विभाग के आला अधिकारी भी शामिल हैं।

उच्च स्तरीय पत्राचार:

सभी संबंधित विभागों ने औपचारिक पत्र जारी कर दिए हैं, जिससे अब इस मामले को दबाना मुश्किल हो गया है।

तहलका पत्रिका की जांच में यह संकेत मिले हैं कि पार्क के निर्माण और रखरखाव के नाम पर करोड़ों की राशि का बंदरबांट हुआ है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आए फंड का उपयोग निजी हितों के लिए किए जाने के आरोप लग रहे हैं।

वर्तमान स्थिति:

विभाग के भीतर हड़कंप का माहौल है और “गले की हड्डी” बन चुके इस मामले में अब किसी भी वक्त बड़ी गाज गिर सकती है। अधिकारियों के बीच जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपने का दौर शुरू हो चुका है। इस मामले में बालोद वन विभाग की भूमिका सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। जिस तरह से प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने इस पर अपनी नजरें टेढ़ी की हैं, उससे स्पष्ट है कि यह केवल स्थानीय स्तर का भ्रष्टाचार नहीं रह गया है।

दस्तावेजों को गायब करने की कोशिश:

सूत्रों का कहना है कि जांच टीम के पहुँचने से पहले ही कुछ महत्वपूर्ण फाइलों और बिलों में बदलाव किया गया है, लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडिट रिपोर्ट ने अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

यह मामला अब छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में “हॉट टॉपिक” बना हुआ है क्योंकि इसमें कई बड़े नामों के फंसने की आशंका है।

बालोद पर्यावरण पार्क मामले में तहलका पत्रिका और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर कुछ अहम कड़ियाँ जुड़ती नजर आ रही हैं। भ्रष्टाचार के इस जाल में विभाग के भीतर और बाहर के सिंडिकेट का खुलासा हो रहा है:

जांच के घेरे में ठेकेदार और वेंडर

रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ खास पंजीकृत ठेकेदारों (Registered Contractors) को ही बार-बार काम दिया गया।

बिना निविदा (Tender) के काम: कई निर्माण कार्यों में टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया या फिर ‘टुकड़ों में काम’ (Splitting of work) दिखाकर अपने चहेते ठेकेदारों को उपकृत किया गया।

सप्लायर फर्म्स:

पार्क में लगाए गए पौधों, बेंचों और अन्य सौंदर्यीकरण सामग्री की सप्लाई करने वाली फर्मों के बिलों की जांच की जा रही है। आरोप है कि ये फर्म्स केवल कागजों पर थीं या अधिकारियों के करीबियों की थीं।

‘बैक-डेट’ एंट्री का खेल

PMO के सख्त रुख के बाद विभाग में मची खलबली का सबसे बड़ा कारण दस्तावेजों की हेराफेरी है।

सूत्रों के अनुसार, ऑडिट टीम से बचने के लिए पुराने स्टॉक रजिस्टर में नई प्रविष्टियां (Entries) की जा रही हैं।

जो सामान कभी पार्क पहुँचा ही नहीं, उसे भी ‘उपयोग किया गया’ दिखाने की कोशिश हो रही है।

IFS अवार्ड पर ‘ब्रेक’

कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के लिए यह मामला उनके करियर का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। IFS अवार्ड की प्रक्रिया में “विजिलेंस क्लीयरेंस” (Vigilance Clearance) अनिवार्य होती है।

इस व्यापक भ्रष्टाचार की शिकायत सीधे PMO और पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) तक पहुँचने के कारण, संबंधित अधिकारियों को अब क्लीन चिट मिलना लगभग नामुमकिन लग रहा है।

टॉप टू बॉटम कार्यवाही की जद में कौन?

जांच का दायरा केवल बालोद तक सीमित नहीं है:

स्थानीय स्तर:

रेंजर और एसडीओ (SDO) स्तर के अधिकारी, जो मौके पर काम की निगरानी कर रहे थे।

जिला स्तर:

तत्कालीन डीएफओ (DFO), जिनकी मंजूरी के बिना भुगतान संभव नहीं था।

मुख्यालय स्तर:

वे अधिकारी जिन्होंने तकनीकी स्वीकृति (Technical Sanction) और बजट आवंटन में आंखें मूंद रखी थीं।

अगला कदम:

इस मामले में जल्द ही कुछ निलंबन (Suspensions) और स्थानांतरण (Transfers) की सूची जारी होने की संभावना है।

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