मंत्री के आदेश को ठेंगा! कामधेनु विवि में जांच से पहले भर्ती की तैयारी, राज्यपाल तक पहुंची शिकायत, ​जांच रुकने तक प्रक्रिया स्थगित करने का था निर्देश, विधायक की शिकायत के बाद भी विवि की मनमानी से उठे गंभीर सवाल

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​दुर्ग/अंजोरा : दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, अंजोरा में चल रही भर्ती प्रक्रिया अब एक बड़े प्रशासनिक टकराव और विवाद का रूप ले चुकी है. छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विकास एवं पशुधन विकास मंत्री रामविचार नेताम द्वारा उच्चस्तरीय जांच के आदेश और भर्ती प्रक्रिया स्थगित करने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन का आगे बढ़ना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

​मंत्री की नोटशीट: गंभीर अनियमितताओं पर जांच और रोक का आदेश
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विश्वविद्यालय में LBI Centre परियोजना समेत कई प्रशासनिक कार्यों में बड़ी गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई हैं. मंत्री की नोटशीट में वेतन संरक्षण, स्थानीय शिक्षकों की पदोन्नति में अनदेखी, आरक्षण एवं रोस्टर निर्धारण में फेरबदल, बैकलॉग पदों की मनमानी भर्ती और स्वीकृत सेटअप से ज्यादा पदों पर विज्ञापन जारी करने जैसे गंभीर बिंदुओं का उल्लेख है.

​मामले की गंभीरता को देखते हुए मंत्री रामविचार नेताम ने न केवल उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने का निर्देश दिया, बल्कि अपनी नोटशीट में सख्त हिदायत भी दी:

​“उपरोक्त शिकायत की जांच हेतु उच्च स्तरीय जांच समिति गठित कर जांच पूर्ण होने तक समस्त आगामी भर्ती प्रक्रिया को स्थगित किया जाये।”
​इसके बावजूद, जांच पूरी हुए बिना विश्वविद्यालय का भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाना शासन के आदेशों के सीधे उल्लंघन और प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है. विधायक ललित चंद्राकर ने राज्यपाल से की शिकायत, पीएससी से भर्ती की मांग
​विवाद केवल मंत्री के आदेश तक सीमित नहीं है.

दुर्ग ग्रामीण विधायक ललित चंद्राकर ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए राज्यपाल को पत्र भेजकर भर्ती की निष्पक्षता पर चिंता जताई है. विधायक ने पत्र में उल्लेख किया है कि विश्वविद्यालय की भर्ती को लेकर स्थानीय युवाओं और प्रबुद्धजनों में भारी असंतोष है.
​पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विधायक ने मांग की है कि इस भर्ती प्रक्रिया को विश्वविद्यालय प्रशासन के हाथ से निकालकर छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) या किसी अन्य निष्पक्ष प्रदेश स्तरीय एजेंसी के माध्यम से कराया जाए.

​शासन बनाम विवि प्रशासन: आखिर किसके शह पर उड़ रही नियमों की धज्जियां?
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एक तरफ जहां विभागीय मंत्री के आदेश पर भर्ती प्रक्रिया रोकी जानी थी और दूसरी तरफ क्षेत्रीय विधायक ने पूरे मामले को राजभवन तक पहुंचा दिया है, वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन की बेफिक्री समझ से परे है। अब सवाल सिर्फ नियुक्तियों का नहीं, बल्कि यह है कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन शासन के स्पष्ट निर्देशों से भी ऊपर हो गया है?

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