मां बगलामुखी के वस्त्र से लेकर हर सामग्री होता है पीला, जानें इसकी मान्यता और कारण

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बिहार के गोपालगंज जिला मुख्यालय से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर मां बगलामुखी का मंदिर स्थित है. यह 51 शक्तिपीठ में से एक, मां कामख्या का रूप है. मां बगलामुखी का स्वरूप काफी अलग है. वो एक हाथ में क्षोभ नामक दैत्य का जिह्वा धरण किए हुए हैं तथा दूसरे हाथ में मुगदर लिए हुए है. मां का यह स्वरूप ही देखने के लिए यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं.

बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना वर्ष 2012 में महर्षि शिवानन्द जी के द्वारा परम श्रद्धेय राजमंगल त्रिपाठी के आर्शीवाद से संपन्न हुआ था. यहां के मुख्य पुजारी महर्षि शिवानन्द जी के ऊपर मां की असीम कृपा है. महर्षि शिवानन्द जी सिद्ध पुरुषों में से एक हैं. उन्होंने लगातार 21 वर्ष मां कामाख्या के यहां तपस्या करने के बाद गोपालगंज के कुचायकोट में मां बगलामुखी मंदिर की स्थापना की.

हिंदू धर्म में पीला रंग को काफी शुभ माना जाता है. मां बगलामुखी के वस्त्र से लेकर कर उनकी हर सामाग्री का रंग पीला है. माना जाता है कि हरिद्रा नामक सरोवर से मां की उत्पति हुई थी. इसलिए वर्ण से लेकर वस्त्र, न्योवेदी से लेकर सभी वस्तु पीला रंग का ही प्रयोग में लाया जाता है. मां बगलामुखी माता का पाठ करने से श्रद्धालु को विद्या, लक्ष्मी, यश, कीर्ति, ऐश्वर्य, संतान सुख की प्राप्ति होती है. मुख्य पुजारी महर्षि शिवानन्द जी ने बताया कि मां बगलामुखी शत्रु संहारक हैं. शत्रु पराजय से कामना के लिए मां के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है.

पूर्णिमा में उमड़ती है श्रद्धालुओं की सर्वाधिक भीड़

शिवानन्द जी का कहना है कि यहां पूर्णिमा के दिन भव्य तरीके से पूजा-अर्चना होती है तथा महाभंडारे का वृहद आयोजन किया जाता है. इसमें श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है. मां की असीमा कृपा से हर वर्ष विशाल यज्ञ का अयोजन होता है. यज्ञ में बिहार सहित उत्तर प्रदेश ओर नेपाल से भी लोग आते हैं. कुचायकोट की धरती हर साल होने वाले यज्ञ के मंत्रोच्चारण से धन्य हो जाती है.

यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि मां बंगलामुखी की असीम कृपा है. हर वर्ष यज्ञ होने से यहां का वातावरण काफी शुद्ध रहता है, और हमेशा सुख-शांति बनी रहती है.

 

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