Oil sample test: डाबर के बाद अब फॉर्च्यून सनफ्लावर ऑयल, पेप्सिको और रेड बुल की बारी, सैंपल लैब टेस्ट में फेल, गुणवत्ता में कमी, FSSAI ने लगाया जुर्माना

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देश के खाद्य सुरक्षा नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने बड़ी कार्रवाई की है. फॉर्च्यून ब्रांड बेचने वाली कंपनी अडानी विल्मर पर जुर्माना लगाया गया है. यह जुर्माना उत्पाद की गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर लगा है.
गोवा के ताज फोर्ट अगुआडा रिजॉर्ट से लिए गए फॉर्च्यून फ्रायोला रिफाइंड सनफ्लावर तेल के सैंपल की जांच हुई थी. जांच में तेल में विटामिन डी की मात्रा तय सीमा से काफी कम मिली. कंपनी ने इस पर रिपेल लैब से अपील भी की थी.
वहीं, दोबारा जांच में भी विटामिन डी की कमी की पुष्टि हो गई. इसके बाद सेंट्रल लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने कंपनी पर जुर्माने की मंजूरी दे दी. गोवा के एडजुडिकेटिंग अफसर ने मैंगलोर स्थित एडब्ल्यूएल एग्रो प्रोडक्ट्स के बिजनेस पर यह जुर्माना लगाया.
पेप्सिको और रेड बुल को नहीं मिली राहत
इसी बीच एनर्जी ड्रिंक बनाने वाली कंपनियों पर भी सख्ती बढ़ गई है. एफएसएसएआई ने जुलाई में पेप्सिको, रेड बुल, मॉन्स्टर और अन्य कंपनियों को नोटिस दिया था. इन कंपनियों को हाई कैफीन ड्रिंक्स के लेबल से एनर्जी ड्रिंक शब्द हटाने का आदेश दिया गया था. इसके लिए कंपनियों को 90 दिन का समय दिया गया. वहीं, कंपनियों ने इस समयसीमा में राहत देने से इंकार कर दिया है.
दरअसल कंपनियों ने एक साल की मोहलत मांगी थी. कंपनियों का कहना था कि मौजूदा स्टॉक 60 से 90 दिन में खप सकता है. राजस्थान और लद्दाख में स्टिंग, कैफ एनर्जी और रेड बुल कैंपेन पहले ही जब्त हो चुके हैं. नियामक ने साफ कर दिया कि तय समय सीमा में ही बदलाव करना होगा.
डाबर पर पहले हो चुकी है कार्रवाई
यह पहला मौका नहीं है जब एफएसएसएआई ने किसी बड़ी कंपनी पर सख्ती दिखाई हो. इससे पहले नियामक ने डाबर इंडिया के कई प्रोडक्ट्स की बिक्री रोकने का आदेश दिया था. यह कार्रवाई शहद, घी, नारियल तेल और तिल के तेल जैसे उत्पादों पर लागू हुई थी. नियामक का कहना था कि डाबर अपने प्रोडक्ट्स पर 100% नैचुरल और 100% प्योर जैसे दावे कर रही थी.
यह दावे मौजूदा नियमों के अनुरूप नहीं पाए गए थे. कंपनी को 15 दिन में एक्शन टेकन रिपोर्ट यानी एटीआर (Action Taken Report) जमा करने को कहा गया था. यह भी सामने आया कि डाबर को पहले भी इस बारे में नोटिस भेजा गया था. लेकिन संतोषजनक सुधार नहीं हुआ. अब फॉर्च्यून, पेप्सिको और रेड बुल पर कार्रवाई से साफ है कि नियामक बड़ी कंपनियों पर लगातार निगरानी बढ़ा रहा है.
रिलायंस और अन्य कंपनियों को भी नहीं मिली छूट
सिर्फ पेप्सिको और रेड बुल ही नहीं, रिलायंस के कैंपा एनर्जी ड्रिंक को भी लेबल से एनर्जी ड्रिंक शब्द हटाने की मोहलत नहीं मिली. मॉन्स्टर और अन्य कंपनियों पर भी यही नियम लागू होता है. नियामक का कहना है कि यह शब्द उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकता है.
असल में एनर्जी ड्रिंक शब्द सुनकर ग्राहक इसे सेहत के लिए फायदेमंद समझने लगते हैं. जबकि इन ड्रिंक्स में कैफीन की मात्रा काफी ज्यादा होती है. यही वजह है कि नियामक इस लेबलिंग को लेकर सख्त रुख अपना रहा है. कंपनियों को अब जल्द से जल्द अपने पैकेजिंग में बदलाव करना होगा.
दिल्ली हाईकोर्ट से डाबर को मिली राहत
इसी बीच डाबर इंडिया को दिल्ली हाईकोर्ट से एक अलग मामले में राहत मिली है. जहां अदालत ने शहद, घी और तेल पर 100 प्रतिशत दावों को लेकर लगी पाबंदी पर रोक लगाई. कोर्ट ने सुनवाई का मौका न देने को इसकी बड़ी वजह बताया.
यानी नियामक की कार्रवाई और अदालत के फैसले साथ साथ चल रहे हैं. इससे यह भी साफ होता है कि कंपनियां नियामक के फैसलों को कानूनी तौर पर चुनौती भी दे सकती हैं. आने वाले समय में इस तरह के मामलों में और स्पष्टता आने की उम्मीद है.
क्यों बढ़ रही है सख्ती
एफएसएसएआई की यह सख्ती अचानक नहीं आई है. दरअसल देश में एनर्जी ड्रिंक की बिक्री तेजी से बढ़ रही है. यूरोमॉनिटर के मुताबिक एनर्जी ड्रिंक्स की बिक्री सालाना 12.6 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है. यह रफ्तार अमेरिका और चीन से भी ज्यादा है.
बीते साल भारत में एनर्जी ड्रिंक की बिक्री 90.7 करोड़ लीटर रही. यह आंकड़ा साफ बताता है कि युवाओं में इन ड्रिंक्स की मांग तेजी से बढ़ रही है. खासतौर पर 15 से 19 साल के ग्राहकों और ग्रामीण इलाकों में इसका चलन ज्यादा है. यही वजह है कि नियामक अब लेबलिंग और गुणवत्ता दोनों पर सख्ती दिखा रहा है.
ब्रिटेन में पहले से ही सख्त नियम
भारत के अलावा दूसरे देशों में भी एनर्जी ड्रिंक को लेकर सख्त कानून हैं. ब्रिटेन में अप्रैल 2027 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों को एनर्जी ड्रिंक बेचना पूरी तरह बंद हो जाएगा. हालांकि यह आदेश संसद की मंजूरी के बाद ही लागू होगा
वहीं 2017 में पेप्सी की स्टिंग लॉन्च होने के बाद से एनर्जी ड्रिंक का चलन और तेज हुआ है. खासतौर पर 15 से 19 साल के ग्राहकों और ग्रामीण इलाकों में इसकी बिक्री तेजी से बढ़ी है. भारत में भी विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों और किशोरों के लिए ऐसे नियम जरूरी हो सकते हैं.
आगे क्या हो सकता है
एफएसएसएआई की यह कार्रवाई आने वाले समय में और सख्त हो सकती है. कंपनियों को अब लेबलिंग और गुणवत्ता दोनों पर ज्यादा सतर्क रहना होगा. डाबर, फॉर्च्यून, पेप्सिको और रेड बुल जैसी बड़ी कंपनियों पर कार्रवाई से बाकी ब्रांड्स को भी सीख लेनी होगी.
उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की बात है कि नियामक भ्रामक दावों पर नजर रख रहा है. आने वाले महीनों में और भी कंपनियों पर जांच की कार्रवाई हो सकती है. इससे खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आने की उम्मीद है.

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