भ्रष्टाचार मुक्त भारत के संकल्प को चुनौती:
आरटीआई अधिनियम की धारा 6(2) और नियमों के उल्लंघन पर राज्य एवं केंद्रीय सूचना आयोग से होगी लिखित शिकायत
विशेष संवाददाता / समाचार डेस्क बालोद
छत्तीसगढ़। पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 का सरकारी दफ्तरों में किस कदर मखौल उड़ाया जा रहा है. इसका एक अनोखा और चौंकाने वाला मामला छत्तीसगढ़ प्रदेश में सामने आया है. जिला स्तर के एक जिम्मेदार जन सूचना अधिकारी (PIO) की अज्ञानता और बौखलाहट का आलम यह है कि आवेदक द्वारा भ्रष्टाचार के अंदेशे के तहत मांगी गई जनहित की जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय, उल्टा आवेदक की ही व्यक्तिगत जानकारी और मंशा मांगने के लिए द्वेषपूर्ण पत्र जारी कर दिया गया है.
इस मनमाने रवैये से साफ जाहिर होता है कि अधिकारी को न तो सूचना का अधिकार अधिनियम के संवैधानिक प्रावधानों का ज्ञान है और न ही वे शासकीय सेवा नियमों के प्रति गंभीर हैं. जानकारी छिपाने के इस रवैये से संबंधित विभाग में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार होने की प्रबल आशंका को बल मिल रहा है.
कानून की अनदेखी:
धारा 6(2) का सीधा उल्लंघन
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(2) में स्पष्ट उल्लेख है:
”सूचना के लिए अनुरोध करने वाले आवेदक से उसके नाम और पत्राचार के पते के सिवाय, सूचना प्राप्त करने का कोई कारण बताने या कोई अन्य व्यक्तिगत ब्योरा देने के लिए नहीं कहा जाएगा.”
इसके बावजूद, जन सूचना अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए नियम-विरुद्ध पत्राचार किया. कानूनन आवेदक जानकारी मांगने का कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है. बल्कि जन सूचना अधिकारी कानूनन सही समय-सीमा के भीतर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हैं.
किन-किन धाराओं और प्रावधानों के तहत घिरे अधिकारी?
जन सूचना अधिकारी द्वारा आरटीआई अधिनियम और लोक सेवा नियमों के विपरीत जाकर किए गए द्वेषपूर्ण कार्य के लिए उनके विरुद्ध निम्नलिखित धाराओं व प्रावधानों के तहत कड़ी दंडात्मक व अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बनता है:
आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 20(1) (अर्थदंड/पेनल्टी): बिना किसी वैध कारण के सूचना रोकने, भ्रामक पत्राचार करने या आवेदन को बाधित करने पर प्रतिदिन ₹250 के हिसाब से अधिकतम ₹25,000 तक का जुर्माना संबंधित अधिकारी के वेतन से वसूलने का स्पष्ट प्रावधान है.
आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 20(2) (अनुशासनात्मक कार्रवाई): बार-बार अथवा दुर्भावनापूर्ण तरीके से सूचना देने से इनकार करने पर राज्य या केंद्रीय सूचना आयोग संबंधित अधिकारी के विरुद्ध सेवा नियमों के तहत विभागीय अनुशासनात्मक जांच (Departmental Inquiry) की सिफारिश करता है.
धारा 4 एवं धारा 7(1) का उल्लंघन:
लोक अधिकारियों की बाध्यताओं (धारा 4) और निश्चित समय-सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध कराने (धारा 7(1)) के अनिवार्य वैधानिक कर्तव्य की अवहेलना करना.
सिविल सेवा आचरण नियम (Civil Services Conduct Rules): पदीय दायित्वों का निर्वहन न करना, शासकीय शक्ति का दुरुपयोग कर आवेदक को हतोत्साहित करना और द्वेषपूर्ण (Malafide) मंशा से पत्राचार करना गंभीर प्रशासनिक दुराचरण की श्रेणी में आता है.
”भ्रष्टाचार मुक्त भारत” के संकल्प को अंगूठा दिखाने की कोशिश
माननीय प्रधानमंत्री महोदय के “जीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन” और भ्रष्टाचार मुक्त भारत के विजन को जमीनी स्तर पर पलीता लगाने का काम ऐसे अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है. लोक प्राधिकारियों की वैधानिक बाध्यता है कि वे सार्वजनिक निधियों और कार्यों से जुड़ी जानकारी पारदर्शिता के साथ सामने रखें. जानकारी छिपाने की यह छटपटाहट यह सिद्ध करती है कि विभाग के भीतर कोई बड़ा घोटाला दबाने का प्रयास किया जा रहा है.
साक्ष्यों के साथ राज्य व केंद्रीय सूचना आयोग में शिकायत की तैयारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित व सचेत नागरिकों द्वारा जन सूचना अधिकारी के इस असंवैधानिक व द्वेषपूर्ण पत्र के विरुद्ध राज्य सूचना आयोग (SIC) तथा केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के समक्ष सभी दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ लिखित शिकायत दर्ज कराई जा रही है. शिकायत में अधिकारी के विरुद्ध सख्त दंडात्मक कार्रवाई करने और अविलंब मांगी गई समस्त जानकारियां निःशुल्क उपलब्ध कराने की मांग की जाएगी.
2026-07-25











