ट्रांसफर के बाद भी कुर्सी से ‘फेविकोल’ सा चिपकाव: वन विभाग में शासन के आदेशों की उड़ीं धज्जियां, DFO और सस्पेंड होने से बचे अफसरों की ‘सांठ-गांठ’ से उठी बगावत की बू!

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​रायपुर : छत्तीसगढ़ के वन विभाग में इन दिनों शासकीय नियमों और प्रशासनिक गरिमा की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। शासन द्वारा जारी स्थानांतरण आदेशों को ताक पर रखकर अधिकारी अपनी पुरानी कुर्सियों पर इस कदर चिपके हुए हैं, मानो विभाग उनकी निजी जागीर हो।
पदोन्नति और तबादले के महीनों बाद भी साहबान अपनी नई पोस्टिंग पर जाने के बजाय पुरानी मलाईदार रेंजों और उप-वनमंडलों का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं, और इस पूरे मायाजाल को शह दे रहे हैं खुद वन मंडलाधिकारी (DFO)।

पदोन्नति का ‘प्रमोशन’ स्वीकार, लेकिन कुर्सी का ‘मोह’ बरकरार

विभाग में पोस्टिंग का अजीब ही मायाजाल फैला हुआ है। कई सहायक वन संरक्षक (ACF) स्तर के अधिकारियों की नई पदस्थापना हो चुकी है, लेकिन वे आज भी रेंजर स्तर के प्रभार (रेंज चार्ज) को सीने से लगाए बैठे हैं।
अपनी पहली क्लास-वन अफसर वाली पोस्टिंग पर जाने से इन साहबों को परहेज है।
सवाल यह उठता है कि आखिर रेंज के प्रभार में ऐसा कौन सा ‘अमृत’ छिपा है कि पदोन्नति के बाद भी ये अधिकारी उच्च पद की जिम्मेदारी संभालने के बजाय पुरानी टेबल से हटने को तैयार नहीं हैं?

​DFO साहब का नया फंडा:

“अगला आएगा, तब पिछला जाएगा”

इस पूरे प्रशासनिक अराजकता में सबसे रहस्यमयी भूमिका वन मंडलाधिकारियों (DFO) की सामने आ रही है। स्थानांतरण आदेश का कड़ाई से पालन कराने के बजाय DFO खुद इन अधिकारियों को रिलीव नहीं कर रहे हैं। ऐसा लगता है मानो पूर्व में पदस्थ रहे चहेते रेंजरों के जाने का सदमा DFO साहब बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं!

​रिलीव न करने के लिए अब एक नया और मनगढंत ‘प्रशासनिक फंडा’ ईजाद किया गया है—
“जब तक तत्कालीन (अगला) अधिकारी प्रभार लेने रिलीव होकर नहीं आएगा, तब तक वर्तमान अधिकारी को रिलीव नहीं किया जाएगा।”
​ नतीजा यह कि अधिकारी न वहां से रिलीव हो रहे हैं और न ही नई जगह प्रभार ले रहे हैं। ‘यथास्थिति’ का यह बहाना बनाकर शासकीय आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
​शासन को सीधी चुनौती, क्या बैठ चुका है व्यवस्था का इकबाल?

स्थानांतरण आदेश राज्य सरकार और शासन के होते हैं, किसी अधिकारी की व्यक्तिगत इच्छा-अनिच्छा के मोहताज नहीं। लेकिन वन विभाग में चल रहा यह खेल साफ दर्शाता है कि अधिकारियों को न तो शासन के चाबुक का डर है और न ही प्रशासनिक अनुशासन का।
ट्रांसफर ऑर्डर को ठेंगा दिखाकर आंखें दिखाने का यह रवैया सीधे तौर पर राज्य सरकार के इकबाल को चुनौती है।

​यदि शासन के स्पष्ट आदेशों के बावजूद अधिकारी कुर्सियों पर जमे हुए हैं और DFO उन्हें ढाल प्रदान कर रहे हैं, तो उच्च स्तरीय जांच होना तय है.
देखना यह होगा कि इस ‘कुर्सी मोह’ और DFO की सरपरस्ती पर शासन का चाबुक कब चलता है या फिर वन विभाग में यूं ही अफसरों की मनमानी का ‘जंगल राज’ कायम रहेगा.
ट्रांसफर के बाद भी कुर्सी से ‘फेविकोल’ सा चिपकाव:
वन विभाग में शासन के आदेशों की उड़ीं धज्जियां, अफसरों की ‘सांठ-गांठ’ से उठी बगावत की बू!

​पदोन्नति का ‘प्रमोशन’ स्वीकार, लेकिन कुर्सी का ‘मोह’ बरकरार

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