तहलका पत्रिका की खबर का असर: जागी सोई ‘हाईवे ब्रिगेड’, रात के अंधेरे में याद आई नाली निर्माण की ‘नैतिकता’!

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​बालोद : कहते हैं कि अगर सोए हुए को जगाना हो तो शंखनाद करना पड़ता है, और जब बात ‘तहलका पत्रिका’ के तीखे समाचारों की हो, तो असर होना तय है!
नेशनल हाईवे 930 पर व्यवस्था के नाम पर चादर तानकर सो रहे जिम्मेदार महकमे के कानों तक आख़िरकार जनता की चीख-पुकार पहुँच ही गई।

​’तहलका पत्रिका’ द्वारा प्रमुखता से उठाई गई खबर के बाद एनएच-930 के हुक्मरानों की नींद ऐसी टूटी कि रातों-रात नाली निर्माण का काम शुरू करा दिया गया। जो काम महीनों से फाइलों में धूल फांक रहा था, वह खबर छपते ही अचानक ‘आपातकालीन सेवा’ में तब्दील हो गया!

​पर ठहरिए… क्या व्यवस्था वाकई सुधर गई?
काम तो शुरू हो गया है, लेकिन कार्यशैली अब भी वही पुरानी ढर्रे वाली—यानी लचर की लचर! आधी-अधूरी तैयारी, सुरक्षा मानकों का अभाव और बदहाल ट्रैफिक के बीच हो रहा यह निर्माण कार्य यह जताने के लिए काफी है कि जिम्मेदार सिर्फ ‘खानापूर्ति’ कर रहे हैं या वाकई कोई ठोस सुधार?

​इस ‘रातों-रात जागे विकास’ के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी, ठेकेदार व इंजिनियर की कारस्तानी और बाकी बचे बदहाल रास्तों का क्या हुआ? जानिए हमारी विस्तृत रिपोर्ट में…
​(बने रहें ‘तहलका पत्रिका’ के साथ, निष्पक्ष और बेबाक खबरों के लिए!)

 

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