बिजली सप्लाई में निजी क्षेत्र की एंट्री सरकार बिजली कंपनी बेचना चाह रही- दीपक बैज. 50 साल के लिए रायपुर एयरपोर्ट का सौदा, महंगा होगा सफर?

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50 साल के लिए रायपुर एयरपोर्ट का सौदा, महंगा होगा सफर?
रायपु र : राजधानी रायपुर एयरपोर्ट को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. केंद्र सरकार देश के 11 एयरपोर्ट को निजी ऑपरेटरों को सौंपने की तैयारी में है, जिसमें रायपुर एयरपोर्ट भी शामिल है. प्रस्तावित प्रक्रिया के तहत सबसे ऊंची बोली लगाने वाली कंपनी को 2028 के बाद 50 साल तक एयरपोर्ट संचालन की जिम्मेदारी मिल सकती है. हालांकि, एयरपोर्ट की सुरक्षा और एयर ट्रैफिक कंट्रोल की कमान सरकारी एजेंसियों के पास ही रहेगी.
50 साल के लिए निजी कंपनी के हाथ में कमान
केंद्र सरकार की प्रस्तावित योजना के तहत रायपुर एयरपोर्ट के संचालन के लिए टेंडर और बिड प्रक्रिया शुरू की जाएगी। बिड, टेंडर और हैंडओवर की पूरी प्रक्रिया में करीब दो साल लगने की संभावना बताई जा रही है. इसके बाद चयनित निजी कंपनी को 50 साल की अवधि के लिए एयरपोर्ट संचालन सौंपा जा सकता है. निजी ऑपरेटर से सरकार को तय राशि प्राप्त होगी और एयरपोर्ट के दैनिक संचालन, प्रबंधन तथा व्यावसायिक गतिविधियों की जिम्मेदारी निजी कंपनी के पास होगी.
टिकट से पार्किंग तक खर्च बढ़ने की आशंका
एयरपोर्ट के निजीकरण के साथ यात्रियों के लिए सुविधाएं बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन टिकट और पार्किंग सहित कुछ सेवाओं की लागत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है. देश के कई निजी एयरपोर्ट पर यात्रियों को बेहतर सुविधाओं के साथ अलग-अलग शुल्कों का भी सामना करना पड़ता है. हालांकि विमान किराया सीधे एयरपोर्ट ऑपरेटर तय नहीं करता. हवाई टिकट की कीमतों पर एयरलाइंस, मांग, रूट और अन्य परिचालन लागत का भी असर होता है.
इंटरनेशनल फ्लाइट की उम्मीद को मिल सकता है जोर
रायपुर एयरपोर्ट के निजी संचालन के बाद इसके विस्तार और आधुनिकीकरण को लेकर उम्मीद बढ़ सकती है. निजी ऑपरेटर आमतौर पर एयरपोर्ट की व्यावसायिक क्षमता बढ़ाने, यात्री सुविधाओं को बेहतर करने और नए एयर कनेक्शन विकसित करने पर जोर देते हैं. ऐसे में रायपुर से भविष्य में इंटरनेशनल कनेक्टिविटी बढ़ाने की संभावना को भी बल मिल सकता है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय उड़ान शुरू होना केवल एयरपोर्ट ऑपरेटर पर निर्भर नहीं करता और इसके लिए अलग-अलग नियामकीय एवं परिचालन मंजूरियां जरूरी होती हैं.
अडानी, GMR और L&T जैसी कंपनियों की नजर
रायपुर एयरपोर्ट की मौजूदा टर्मिनल सुविधाओं, रनवे, पार्किंग क्षमता और यात्री संख्या को देखते हुए कई बड़ी कंपनियों की संभावित दिलचस्पी मानी जा रही है. संभावित दावेदारों में Adani Airport Holdings, GMR Airports, Larsen & Toubro, GVK Group और IRB Infrastructure जैसे बड़े नाम चर्चा में हैं. हालांकि, अंतिम तौर पर कौन-कौन सी कंपनियां बोली लगाएंगी, यह आधिकारिक बिड प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा.
पांच समूहों में बांटे गए एयरपोर्ट
प्रस्तावित योजना में 11 एयरपोर्ट को अलग-अलग समूहों में रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक-
ग्रुप 1: वाराणसी, गया और कुशीनगर
ग्रुप 2: तिरुचिरापल्ली और तिरुपति
ग्रुप 3: अमृतसर और कांगड़ा
ग्रुप 4: भुवनेश्वर और हुबली
ग्रुप 5: रायपुर और औरंगाबाद/छत्रपति संभाजीनगर
रायपुर एयरपोर्ट के लिए क्या बदलेगा?
निजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद एयरपोर्ट के संचालन का मॉडल बदल सकता है। यात्रियों को बेहतर टर्मिनल सुविधाएं, पार्किंग और व्यावसायिक सेवाएं मिल सकती हैं. दूसरी तरफ इन सुविधाओं के बदले कुछ शुल्क बढ़ने की संभावना पर भी नजर रहेगी. यानी रायपुर एयरपोर्ट के लिए निजीकरण एक साथ सुविधा, विस्तार और अतिरिक्त लागत—तीनों का नया दौर लेकर आ सकता है.

बिजली सप्लाई में निजी क्षेत्र की एंट्री सरकार बिजली कंपनी बेचना चाह रही – दीपक बैज
रायपुर : छत्तीसगढ़ में बिजली सप्लाई के लिए निजी कंपनियों को लाइसेंस देने और आईपीओ लाकर सरकारी बिजली कंपनी में हिस्सेदारी बेचने के सरकार के फैसले का कड़ा विरोध करते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा है कि बिजली का वितरण अति आवश्यक सार्वजनिक सेवा है. इस पर पूरा और प्रत्यक्ष नियंत्रण सरकार का ही होना चाहिए. सीधे तौर पर सरकार के द्वारा ही विद्युत वितरण प्रणाली का संचालित होना चाहिए. लेकिय यह सरकार निजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने के लिए ही वितरण के मौजूदा नियमों में बदलाव किया जा रहा है. लाइसेंसिंग प्रणाली लागू करना अनुचित है. निजी कंपनियों का फोकस सिर्फ अपने मुनाफे पर होगा न कि जन सुविधा पर.. पूर्ववर्ती रमन सिंह की सरकार ने पहले सरकारी सरकारी विभाग को सरकारी कंपनी में परिवर्तित किया और अब भारतीय जनता पार्टी की साय सरकार बिजली सप्लाई का लाइसेंस और आईपीओ बेचने जा रही हैं.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि साय सरकार प्रदेश के स्वामित्व वाली सरकारी कंपनी को शेयर मार्केट में लिस्टेड करके शेयर के माध्यम से उसको निजीकरण की ओर ले जाने का प्रयास कर रही है. मंत्रिपरिषद ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड (CSPGCL) को आमजन एवं संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के मकसद से 200 करोड़ रूपए तक के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD)/बॉन्ड जारी कर स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध (लिस्टिंग) किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि छत्तीसगढ़ की विद्युत कंपनिया आत्मनिर्भर है. और बिजली बनाने का पूरा संसाधन राज्य के पास उपलब्ध है. राज्य में बनने वाली बिजली को वितरण का काम पावर ट्रांसमिशन कंपनी के पास है. सरकार इसका शेयर निकालकर उद्योगपतियो को पिछले दरवाजे से बेचने का प्रयास कर रही है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि राज्य विद्युत वितरण कंपनी को अडानी को सौंपने के उद्देश्य से इसका शेयर निकाला जा रहा है. सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन के कारण एक सार्वजनिक कंपनी का आईपीओ निकाला जा रहा है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि महंगी बिजली करने के बाद तथा स्मार्ट मीटर में बेतहाशा वसूली और 400 यूनिट तक बिजली बिल हाफ योजना बंद कर आम आदमी को लूटने के बाद भी सरकार विद्युत कंपनी को आत्मनिर्भर नहीं बना पाई. अब विद्युत कंपनी को ही बेचने का षड़यंत्र किया जा रहा है. सार्वजनिक इकाईयों को बेचने की भाजपा की पुरानी फितरत है. मोदी सरकार ने भी देश की 27 से अधिक सार्वजनिक उपक्रमों को बेचा था। राज्य की भाजपा सरकार अब प्रदेश की रीढ़ की हड्डी विद्युत कंपनी को ही बेचने का षड़यंत्र कर रही है.

छत्तीसगढ़ में टाटा पावर की एंट्री के खिलाफ यूनियनों ने खोला मोर्चा
रायपुर : छत्तीसगढ़ में बिजली के बढ़े हुए बिलों ने लोगों के घर का बजट बिगाड़ दिया है. कई उपभोक्ता दो-तीन गुना तो कहीं चार गुना तक बिल आने की शिकायत कर रहे हैं और इसे लेकर जगह-जगह विरोध भी हो रहा है. वहीं, हाफ बिजली बिल योजना का लाभ नहीं मिलने और लगातार बढ़ती बिजली दरों को लेकर भी उपभोक्ताओं में नाराजगी है.
ऐसे समय में अब बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनी की एंट्री का मामला सामने आया है. टाटा पावर की कंपनी टीपी पॉवर प्लस ने रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसील में बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया है.
जिस आवेदन को अब तक एक नियामक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा था… वह अब सरकारी बिजली व्यवस्था के भविष्य, निजीकरण और उपभोक्ताओं की जेब से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग यानी CSERC ने इस आवेदन को 89/2026 के रूप में दर्ज किया है. 15 जून को दिए गए इस आवेदन पर 15 जुलाई को सुनवाई हो चुकी है और अब 1 अक्टूबर को सुबह 11:30 बजे जनसुनवाई होगी. बिजली इंजीनियरों के संगठन और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए सरकार और आयोग के सामने कई सवाल उठाए हैं.
आवेदन रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसील क्षेत्रों के लिए है. CSERC ने इसे आवेदन क्रमांक 89/2026 के तौर पर रजिस्टर किया है. इसके लिए 1 अक्टूबर को इस आवेदन पर जनसुनवाई होने जा रही है.
खबर सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा. इसके अलावा बिजली इंजीनियरों और कर्मचारियों के संगठन ने विरोध का ऐलान कर दिया. और अब सवाल उठने लगा है— क्या छत्तीसगढ़ की सरकारी बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनी के प्रवेश की तैयारी हो रही है?
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने टाटा पावर के आवेदन का कड़ा विरोध किया. फेडरेशन का कहना है कि वह आयोग के सामने इस आवेदन के खिलाफ विस्तृत आपत्ति दाखिल करेगा. फेडरेशन के चेयरमैन इंजीनियर शैलेन्द्र दुबे ने बिजली वितरण के निजीकरण के किसी भी प्रयास के खिलाफ विरोध की बात कही है. वहीं फेडरेशन के संरक्षक पी.एन. सिंह ने भी कई गंभीर सवाल उठाए हैं.
फेडरेशन चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने कहा कि चैरी पिकिंग यानी निजी कंपनी अगर ज्यादा राजस्व वाले और फायदे वाले उपभोक्ताओं को अपने वितरण क्षेत्र में लेना शुरू करती है, तो सरकारी कंपनी CSPDCL की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा?
फेडरेशन के संरक्षक और छत्तीसगढ़ रिटायर्ड पॉवर इंजीनियर्स एंड ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पीएन सिंह ने कहा कि बिजली सप्लाई का काम निजी कंपनियों के हाथों जाने पर क्रॉस-सब्सिडी, सरकारी नेटवर्क के इस्तेमाल, CSPDCL की वित्तीय स्थिति, बिजली दरों और सभी वर्गों को बिजली देने की सरकारी कंपनी की जिम्मेदारी उठाने में दिक्कत होगी.
इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि अगर सरकारी बिजली कंपनी के पास कमाई वाले उपभोक्ता कम होते गए, तो किसानों और कमजोर वर्गों को मिलने वाली क्रॉस-सब्सिडी व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा.
अब इस पूरे मामले में अगली बड़ी तारीख है. 1 अक्टूबर 2026। सुबह 11:30 बजे CSERC के कार्यालय में जनसुनवाई होगी. यानी अब उपभोक्ताओं, कर्मचारियों और दूसरे हितधारकों को भी अपनी आपत्ति और सुझाव रखने का मौका मिलेगा. और यहीं से साफ होगा कि छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनी की एंट्री का रास्ता कितना आसान है.
असली सवाल यही है कि छत्तीसगढ़ की बिजली व्यवस्था किसके हाथ में रहेगी? सरकार के… या निजी कंपनियों के? और अगर निजी कंपनियां बिजली बांटेंगी… तो उसका फायदा उपभोक्ता को मिलेगा या कंपनी को? इन सभी सवालों का जवाब अब 1 अक्टूबर की जनसुनवाई और उसके बाद CSERC के फैसले से सामने आएगा.

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