दमोह के रानी दमयंती संग्रहालय में मौजूद हैं 10-11वीं शताब्दी की भगवान कुबेर की प्राचीन प्रतिमाएं

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मप्र के दमोह जिले की धरा को कुबेर का खजाना माना जाता है. जमीन के अंदर आज भी अटूट संपदा मौजूद है. भगवान कुबेर की 10-11वीं शताब्दी की दो प्रतिमाएं दौनी ग्राम से, रिचकुड़ी गांव से एक प्रतिमा और एक प्रतिमा नजराना गांव से प्राप्त हुई. ये प्रतिमाएं वर्तमान समय में रानी दमयंती पुरातत्व संग्रहालय में मौजूद है.

मूल रूप से वैदिक-युग के ग्रंथों में बुरी आत्माओं के प्रमुख के रूप में वर्णित, कुबेर ने केवल पुराणों और हिंदू महाकाव्यों में एक देव अर्थात भगवान का दर्जा हासिल किया है.शास्त्रों में वर्णन है कि कुबेर ने एक बार लंका पर शासन किया था, लेकिन उनके सौतेले भाई रावण ने उन्हें उखाड़ फेंका जिसके बाद कुबेर हिमालय के अलकापुरी में बस गए थे. वहीं हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, तीन माह तक प्रतिदिन 108 बार कुबेर मंत्र का जाप करने से भगवान कुबेर प्रसन्न हो जाते हैं.

भगवान कुबेर की चार प्रतिमाएं
पुरात्तव एवं अभिलेखागार अधिकारी सुंरेद्र चौरसिया ने बताया कि रानी दमयंती पुरातत्व संग्रहालय में भगवान कुबेर की चार प्रतिमाएं देखनो को मिलती है. इनमें से दो प्रतिमाएं दौनी ग्राम से प्राप्त हुई है जो 10 से 11वीं शताब्दी की है. और एक प्रतिमा रिचकुड़ी से, तो वहीं एक प्रतिमा नजराना से प्राप्त हुई है. जो 11 से 12वीं शताब्दी की हैं. इस प्रकार से भगवान कुबेर को धन की थैली लिए हुए दिखाया हुआ प्रतीत होता है. दिशाओं के स्वामी के रूप में भगवान कुबेर को जाना जाता है. जो इस संग्रहालय की सुंदर और रोचक प्रतिमाओं में से एक है.

 

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