जंगल सफारी की भुल भुलैया में दफ्न है भ्रष्टाचार के कई राज

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घोटालेबाज और भ्रष्टाचारियों की शरण स्थली बन गया विभाग

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी में बना जंगल सफारी आकर्षण के साथ साथ बहुत से ऐसे राज छिपाकर रखा हुआ है जिसके उजागर होने पर आंखे फटी की फटी रह जाती है। आंखे बंद किये विभाग के मंत्री और आला अफसर सुतुरमुर्ग की मानिंद दिखाई पड़ते हैं। उनके नाक के नीचे बड़े से बड़ा घोटाला हो जाता और उन्हें पता ही नहीं चलता मजेदार बात तो यह है कि घोटाला करने वाले शरणागतों को प्रश्रय और बचने की राह भी बताई जाती है और शरण देकर उन्हें छिपाकर रखा भी जाता है। ऐसे ही एक मामला सामने आया है जिसमें जंगल सफारी जो जानवरों के लिए बनाया गया है जिसमे जानवर तो ठीक है उस जंगल सफारी में अपराधी भी छुपा बैठा हुआ है वो भी छोटा मोटा नही बल्कि 8 करोड़ी अपराधी ! वह वन विभाग की पूर्ण शरण लेकर छुपकर बैठा हुआ है और विभाग के लोगो को खबर ही नही है। वैसे खबर क्यों रहेगी क्योंकि वह विभाग के आला अधिकारियों की आदत बन गई है कि अपने भ्रष्टाचार कर्मचारियों को बचाने की चाहे वो कैम्पा घोटाला हो चाहे तो मरवाही चायपत्ती घोटाला हो या मरवाही नेचर कैम्प घोटाला हो वन विभाग के आला अधिकारी सिर्फ धृतराष्ट्र की तरह आंख बंद करके सिर्फ सुन रहे है करना कुछ नहीं है।

हाल ही में बने नए वन संरक्षक श्रीनिवास राव तो पुराने खिलाड़ी है। उन्ही के नजदीक जंगल सफारी का मामला सामने आया है जंगल सफ़ारी में पदस्थ डॉ. राकेश वर्मा जो कांकेर में 2006 से 2007 तक जिला पंचायत कांकेर में सहायक परियोजना अधिकारी के तौर पर पदस्थ थे। इनके द्वारा बहुत ही बड़ा खेल अपने सहयोगी के साथ मिलकर राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी में 8 करोड़ 44 लाख 60 हजार 719 रुपये का किया गया था। इतना ही नही इनके खिलाफ़ 2010 में राज्य आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो में धारा 409, 420, 10(क्च), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अपराध क्रमांक 58/ 2010 दर्ज किया गया है! लेकिन डॉ. राकेश वर्मा बहुत बड़े खिलाड़ी है ये इतना ही नही चुपके से वन विभाग में चोरी से प्रतिनियुक्ति के तौर पर नौकरी करने लगे। फिर क्या वन विभाग में कहाँ पीछे हटने वाला विभाग द्वारा 2018 में इनका संविलियन भी कर दिया गया और सोने पे सुहागा हो गया। इतना ही नही दिलचस्प बात तो यह है कि विभाग द्वारा राज्य शासन को जिन अधिकारियों का प्रस्ताव भेजा गया था उसमे डॉ. राकेश वर्मा का नाम ही शामिल नही था। कहानी में एक नया मोड़ आ गया कि प्रस्ताव में नाम नही होने के बाद कैसे इनका और किस नियम के तहत संविलियन हो गया। वन विभाग कुछ भी कर सकता है फर्जी प्रमाण पत्र में जब नौकरी करने वाले अधिकारी बने बैठे हैं तो यह तो संविलियन की बात है। वन विभाग के मंत्री इन सबसे बेखबर रहे है।अधिकारी और कर्मचारी तो अपनी जेबे गरम करने में लगे है और फर्जीवाडा की दुकाने जोरो से चलाने में लगी है। प्रश्न यह उठता है कि डॉ. राकेश वर्मा के ऊपर जब अपराध कायम हो गया था तो वह कैसे जंगल सफारी में नौकरी कर रहा है! इसका जवाब किसी के पास नहीं तो यह माना जावे कि वन विभाग अपराधियो को शरण देता है और विभाग में हुये भ्रष्टाचार को दबाने का प्रयास किया जाता है।

कहानी में फिर से एक मोड़ आया डॉ.राकेश वर्मा की गिरफ़्तारी की कार्यवाही सुगबुगाहट जैसे ही शुरू हुई ये भागते हुए स्थानीय न्यायालय में अपनी जमानत के लिए पहुँच गए इनकी जमानत कांकेर स्थानीय न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई उसके बाद ये हाईकोर्ट से जमानत लेकर आ गए और ना तो इनके द्वारा चाहे स्थानीय न्यायालय हो या हाई कोर्ट दोनों में उपस्थित की सूचना अपने विभाग को नहीं दी गई और चुपचाप अपना डेरा जंगल सफारी में डाल लिया। वन विभाग के आला अधिकारियों की नजर इन पर नही जा रही है यहाँ तक जंगल सफारी की आईएफएस श्रीमती एम मर्सी बेला जो इस संदर्भ में जानकारी रखी थी फिर भी उनके द्वारा कोई कार्यवाही नही की गई। अब देखते है प्रशासन डॉ. राकेश वर्मा के खिलाफ क्या करती है।

कादरी की रिपोर्ट…

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