3 धर्मांतरित परिवार की मूल धर्म में हुई वापसी

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छत्तीसगढ़ में बस्तर जिले के एक गांव में ईसाई धर्म अपनाए तीन परिवारों की अब मूल धर्म में वापसी हो गई है। ग्राम सभा में सैकड़ों ग्रामीणों की मौजूदगी में तीनों परिवार के सदस्यों ने मूल धर्म में लौट आएं हैं। इन्होंने ग्राम देवी देवताओं को मानने का संकल्प लिया है। बताया जा रहा है कि, किसी कारणवश ये तीनों परिवार ईसाई धर्म को अपना लिए थे। अब ग्राम देवी-देवताओं के पुजारियों ने पूजा-अर्चना की, हिंदू संगठन के लोगों ने भगवा गमछा और हिंदू ग्रंथ भेंट किया।

दरअसल, यह मामला जिले के भानपुरी के फरसगुड़ा का है। 4 साल पहले ईसाई मिशनिरियों कहने पर इस गांव के रहने वाले सनउ, जगदीश बघेल, और फाल्गुनी समेत इनके परिवार ने धर्मांतरण कर लिया था। ईसाई धर्म के रीति-रिवाज और संस्कृति को मानने लगे थे। लेकिन अब इन्होंने फिर से अपने मूल धर्म में लौटने के इच्छा जताई। फिर गांव के प्रमुख लोगों से बातचीत की। जिसके बाद पहले सारे गांव के लोग इकट्ठा हुए। फिर इन्हें अपने मूल धर्म में वापस लाने पर चर्चा की गई। सभी ने हामी भरी।

जिसके बाद एक दिन पहले गुरुवार को भी पंचायत में ग्राम सभा का आयोजन किया गया था। इसमें तीनों परिवार के सदस्य, ग्राम देवी-देवता के पुजारी, गांव के प्रमुख और हिंदू संगठन के लोग शामिल हुए थे। फिर इन तीनों परिवार को मूल धर्म में लाने के लिए ग्राम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की। फिर पुजारियों ने शुद्धिकरण कर तीनों को ग्राम देवी-देवताओं को मानने का संकल्प दिलाया। अब तीनों परिवार मूल धर्म में लौट आए हैं।

बस्तर में गरमाया हुआ है धर्मांतरण का मामला

दरअसल, पिछले कुछ महीने से बस्तर संभाग के अलग-अलग जिलों में धर्मांतरण का मामला गरमाया हुआ है। यहां मूल धर्म को छोड़कर इसाई धर्म अपनाएं हुए लोगों और आदिवासी समाज के बीच तनातनी की स्थिति बनी हुई है। ईसाई समुदाय के लोगों को गांवों में शव दफनाने की मनाही की गई है। कुछ दिन पहले सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने दैनिक भास्कर को बताया था कि, ईसाइयों का शमशान घाट बना हुआ है। वहां ले जाकर शव को दफनाएं।

हमारे शमशान घाट में शव दफना कर हमारी संस्कृति को अपमानित किया जा रहा है। यदि गांव के किसी भी साधारण व्यक्ति की मौत होती है तो उनके शव को भी दफनाने के लिए माटी पुजारी जब तक जगह नहीं देता है तब तक शव दफन नहीं किया जाता है। चाहे आदिवासी हो या गैर आदिवासी उनके शव को दफनाने अनुमति लेनी पड़ती है।

 

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