विचार एवं विश्लेषण डेस्क
तांदुला जलाशय निर्माण में लगे हजारों मेहनत कश मजदूरों की मजदूरी जब अंग्रेजी हुकूमत ने देनेसे इंकार कर दिया तब मुल्ला बाबा ने अपनी काश्तकारी भूमि 19 एकड़ को उन मजदूरों को मजदूरी के एवज में बांट दिया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर की। ब्रिटिश शासन काल में निर्मित 1906- 1919 का महत्वपूर्ण सिंचाई माध्यम तांदुला एवं सूखा जलाशय बालोद जिले के विकास और समृद्धि का प्रतीक है । लगभग दो लाख एकड़ क्षेत्र में सिंचाई का प्रमुख माध्यम तांदुला जलाशय अंतरराष्ट्रीय स्तर के भिलाई इस्पात संयंत्र को वर्षभर जल आपूर्ति करने के साथ ही अनेकों औद्योगिक संयंत्र ,नगर निगम तथा तीन जिले बालोद ,दुर्ग,बेमेतरा के 3000 से भी अधिक निस्तारी व सिंचाई तालाबों को अपनी जल धारा से लबरेज कर क्षेत्र में जीवनदायिनी जलाशय के रूप में स्थापित है ।
कैसे बना तान्दुला जलाशय…
वर्ष 1894 में धमतरी स्थित क्रिश्चियन हॉस्पिटल का आधारशिला रखने वाले ब्रिटेन के प्रख्यात इंजीनियर सर एडम स्मिथ जिन्हें क्षेत्र के लोग आदम साब कहते थे । वर्ष 1900 के प्रारंभ में इस क्षेत्र में आए भयंकर सूखा और महामारी से यहां के लोगों की जान बचाने के लिए भानूप्रतापपुर, कोरर ,कोरकोट्टी क्षेत्र से बहकर डुमरा पठार (बालोद)के आसपास आने वाली नदी – नालो को तांदुला एवं सूखा जलाशय के रूप में विकसित करने की योजना को मूर्तरूप दिया गया। इंजीनियर एडम स्मिथ और उनकी टीम के सर्वे के बाद वर्ष 1905 में जलाशय निर्माण के लिए एक प्रस्ताव इंग्लैंड भेजी गई परंतु वह निरस्त कर दी गई। नया प्रस्ताव बनाने के लिए इंजीनियर एडम स्मिथ ने अपने करीबी साथी अफगानिस्तान के ठेकेदार मुल्ला बाबा (अब्दुल रहीम खान ) से सलाह मशवरा कर जलाशय बनाने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई , जलाशय के निर्माण में समस्त संसाधन और मजदूरों की मजदूरी मुल्ला बाबा के सुपुर्द किया गया। तब जाकर इंग्लैंड की अंग्रेजी हुकूमत ने इस कार्य की स्वीकृति दी। और वर्ष 1906 में ही सैकड़ों ग्रामीणों के मेहनतकश हाथों , घोड़े ,हाथी तथा खच्चर आदि का उपयोग कर इस जलाशय समूह को वर्ष 1913 में मुकम्मल किया गया । तथा दोनों जलाशय निर्माण के बाद जलाशय से मुख्य नहर,छोटी नहर ,माइनर का भी निर्माण कार्य को वर्ष 1919मेंअंतिम रुप दिया गया ।
आदम साहब की याद में…
तांदुला और सूखा जलाशय निर्माण के पश्चात यहां की आबोहवा इसके निर्माता इंजी.एडम स्मिथ को भा गई तथा वे तांदुला जलाशय के निकट ही एक कॉलोनी बनाकर रहने लगे थे। बांध निर्माण के बाद रोज की तरह एक दिन जलाशय में नहाते हुए वर्ष 1920 में इंजी .एडम स्मिथ की मौत हो गई ।
उनकी स्मृति में ,उनके निवास स्थल को मुल्ला बाबा ने आदमाबाद का नाम दिया ,कुछ इस तरह (आदम+आबाद=आदमाबाद)

ऐसे पड़ा ग्राम मल्लेगुड़ा का नाम…
अफगानिस्तान से यहां जलाशय बनाने के लिए बुलाए गए मुल्ला बाबा उर्फ मुल्ला अब्दुल रहीम खान,जलाशय निर्माण के समय नदी के किनारे जंगल में एक घर बना कर रहते थे ।उनके आसपास कुछ और घर बने इस तरह जलाशय में काम करने वालों की बस्ती बन गई तब से इसका नाम मुल्लेगुड़ा पड़ गया। जलाशय के बनते तक मुल्ला बाबा यही रहने लगे थे । उनके रहने के स्थान को आज भी यहां के लोग मुल्लेगुड़ा ग्राम के नाम से जानते हैं।
(मुल्ले=मुल्ला +गुड़ा=रहने का स्थान=मुल्लेगुडा)। मुल्ला बाबा ने आसपास के ग्रामीणों के लिए एक और बस्ती बसाए जिसे आज भी ग्राम मुल्ला के नाम से जाना जाता है ।जलाशय निर्माण के पश्चात मुल्ला बाबा , ग्राम देऊर तराई में कुछ समय रहे।
अंग्रेज सरकार ने नहीं दी मजदूरों की मजदूरी है…
वर्ष 1920 के अवधि में तांदुला के मुख्य इंजीनियर एडम स्मिथ की मृत्यु के पश्चात जलाशय निर्माण में लगे मजदूरों की मजदूरी और ठेकेदार का मेहनताना देने पर रोक लगा दिया गया। दरअसल वर्ष 1920 के बाद से क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज हो गई थी और क्षेत्र में असहयोग आंदोलन के चलते जलाशय निर्माण कंपनी का पेमेंट रोक दिया गया जिससे कंपनी दिवालिया हो गई। मुल्ला बाबा को कंपनी से 2लाख 60हजार रूपए लेना था। तब चांदी के सिक्कों का चलन था।
चूंकि मुल्ला बाबा, मजदूरों को उनकी मजदूरी अपनी जेब से देते थे। अंग्रेजों से मुल्ला बाबा को रकम नहीं मिलने से मजदूरों की मजदूरी का भुगतान नहीं हो सका । उक्त संदर्भ में समकालीन गवर्नर ने भी ब्रिटिश हुकूमत को पत्र प्रेषित कर मजदूरों की मजदूरी देने की दरकार को हुकूमत ने अनदेखा कर दिया।
अपनी काश्तकारी जमीन किसानों को दे दी..
अंग्रेजी हुकूमत से रकम नहीं मिलने की स्थिति में मुल्ला बाबा ने अपनी काश्तकारी की जमीन जो उन्हें गवर्नर से मिला था। लगभग 19 एकड़ काश्तकारी जमीन को मुल्ला बाबा ने उन सभी ग्रामीण मजदूरों को मजदूरी के एवज में दे दिए और ग्राम देऊरतराई से बालोद जामा मस्जिद में आकर रहने लगे थे ।इसी बीच अपनी मेहनताना रकम हासिल करने के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर भी किया और पेशी में रायपुर जाते थे। जानकार सूत्रों का मानना है कि 1970 के दशक में 105 साल की उम्र में उनका इंतकाल बालोद में ही हुआ ।









