कुछ लोगों को जल्दी-जल्दी सर्दी-जुकाम लग जाती है. इसे हे फीवर कहा जाता है. इसमें नाक से लगातार पानी निकलता रहता है और साइनस प्रोब्लम बढ़ जाता है. आंखें खुजलाने लगती है और छाती में कुछ भरा हुआ सा महसूस होता है. हालांकि यह सर्दी नहीं है लेकिन सर्दी-खांसी के सभी लक्षण इसमें भी परेशान करते हैं. आमतौर पर माना जाता है कि यह वायरल इंफेक्शन है. अब तक इसका सटीक कारण पता नहीं कि आखिर ऐसा क्यों होता है. लेकिन एक अध्ययन में दावा किया गया है कि नाक में रहने वाले कुछ अवांछित बैक्टीरिया इसके कारण हो सकते हैं. मेडिकली यह बात प्रमाणित है कि हमारी हेल्थ की बेहतरी में बैक्टीरिया, वायरस और फंगस का संग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह हमारे इम्यून सिस्टम को भी सपोर्ट देता है. यहां तक कि डिमेंशिया, हार्ट डिजीज और इंफ्लामेटरी बावोल सिंड्रोम से बचाने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि गुड और बैड बैक्टीरिया का संतुलन होना जरूरी है क्योंकि अगर बैड बैक्टीरिया की संख्या बढ़ गई तो यह हमारे पूरे इम्यून सिस्टम को तहस नहस कर सकता है. अध्ययन में पाया गया है कि इसी तरह के बैड बैक्टीरिया का एक संग्रह नाक में अपना घर बनाने लगता है जिसके कारण हे फीवर होता है.
गुड बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाए बगैर बैड बैक्टीरिया होगा खत्म
ग्लोबल डायबेट्स कम्यूनिटी की वेबसाइट के मुताबिक अध्ययन में पाया गया कि कुछ खास किस्म के बैक्टीरिया परागकण (बीमारी फैलाने वाले पराग) को रोकने में इम्यूनिटी सिस्टम को बूस्ट बनाते हैं. पोलेने के कारण ही हे फीवर होता है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नाक में गुड बैक्टीरिया भी रहते हैं और हे फीवर फैलाने वाले बैक्टीरिया भी, तो ऐसे में गुड बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाए बगैर बैड बैक्टीरिया को नाक में कैसे खत्म किया जाए. वैज्ञानिकों ने अध्ययन के आधार पर बताया कि इसे प्रोबायोटिक की मदद से खत्म किया जा सकता है. प्रोबायोटिक गुड बैक्टीरिया को मदद पहुंचाएगा जबकि बैड बैक्टीरिया को खत्म कर देगा. हलांकि अभी यह अध्ययन बहुत शुरुआती चरण में है और इसके लिए और रिसर्च करने की जरूरत है.
प्रोबायोटिक पाउडर से होगा हे फीवर इलाज
हे फीवर तब होता है जब घास-फूस या पेड़ पौधों से निकलने वाले परागकण मुंह, नाक या गले में इम्यून सेल्स के संपर्क में आते हैं. जब पोलेन शरीर में घुसता है तो बॉडी को लगता है कि यह कोई संक्रमण है, इसे खत्म करने के लिए बॉडी से हिस्टामिन निकलता है लेकिन इससे हे फीवर हो जाता है. यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी की एक अन्य रिसर्च के मुताबिक हे फीवर है या नहीं इसे नाक के अंदर जीवाणु के प्रकार से पहचाना जा सकता है. अध्ययन में कहा गया कि हे फीवर के पीड़ित मरीज को प्रोबायोटिक पाउडर देने पर बहुत जल्दी लक्षण कम होने लगते हैं. रिसर्च के डायरेक्टर डॉ. करीन रीड ने बताया कि प्रोबायोटिक को मुंह से लिया जाता है और आंत में जाता है लेकिन जब मेटाबोलाइट्स (प्रोबायोटिक जब आंत में टूटता है तब बायप्रोडक्ट के रूप में मेटाबोलाइट्स बनता है) खून के माध्यम से शरीर के अन्य अंगों में भी पहुंच जाता है जो अप्रत्यक्ष रूप से नाक पर भी असर करता है.









