भगवान शिव के सिर पर क्यों विराजमान है चंद्रमा? ये है बेहद रोचक पौराणिक कथा

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हिंदू धर्म में भगवान भोले को बहुत भोला बताया गया है. मान्यता है कि जो भी भक्त उनकी सच्चे मन से पूजा-अर्चना और आराधना करता है, महादेव उसकी सभी समस्याओं का अंत करते हैं. उस भक्त की हर मनोकामना पूरी करते हैं. भगवान शिव के वेशभूषा पहनावे और उनकी पसंदीदा चीजों को लेकर कई पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं. उसी तरह भगवान भोलेनाथ के सिर पर विराजमान चंद्रमा का कनेक्शन समुद्र मंथन से बताया जाता है.

भगवान भोलेनाथ को बेलपत्र, भांग धतूरा, दुग्धाभिषेक आदि बहुत पसंद है. इन सबके पीछे कोई न कोई पौराणिक कथा या कहानी जरूर है. आपने भगवान महादेव के शीश में चंद्रमा जी को विराजमान देखा होगा. इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है.

समुद्र मंथन की स्टोरी से आप सभी भी वाकिफ ही हैं. इस दौरान हलाहल नामक विष भी निकला था. इसे स्वयं देवाधिदेव शिव ने पान किया था, ताकि इस सृष्टि की रक्षा की जा सके. विषपान करने के बाद विष उनके कंठ में जमा हो गया था, जिसके कारण वो नीलकंठ भी कहलाए.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विषपान के प्रभाव से भगवान भोलेनाथ का शरीर अत्यधिक गर्म होने लगा था. ऐसे में उन्हें शीतलता देने की बहुत जरूरत थी. विष के कारण उनके पूरे शरीर में जलन होने लगी थी. तब चंद्र आदि सभी देवताओं ने शीतलता के लिए उन्हें शीश पर चंद्रमा को धारण करने को कहा.

चंद्र आदि देवताओं की प्रार्थना पर भगवान महादेव ने अपने शीश पर चंद्रमा को धारण कर लिया, जिससे उनके शरीर में शीतलता बनी रहे. श्वेत चंद्रमा बेहद शीतल होते हैं. उनसे पूरी सृष्टि को शीतलता प्रदान होती है. इसी कारण से शिवजी ने उन्‍हें अपने मस्तक पर धारण किया.

समुद्र मंथन के बाद से ही भगवान शिव के शीश पर चंद्रमा शुशोभित है. ये भगवान शिव के आभूषण हैं. भगवान भोलेनाथ की भक्ति बेहद सरल है. जो भी भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करता है उनकी पूजा करता है, महादेव उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं. पौराणिक मान्यता है की सोमवार के दिन भगवान शिव का व्रत और विधि-विधान से उनकी पूजा अर्चना करने से भगवान महादेव उस भक्त पर हमेशा अपनी कृपया बनाए रखते हैं. सोमवार के दिन शंकर जी का जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक के बाद उनकी पसंदीदा चीजें जैसे भांग, धतूरा आदि चढ़ाना चाहिए.

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