हक और बातिल की जंग में इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचा लिया; मसानगंज में आज भी तैयार होती है बताशे की ताजिया

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मोहर्रम का माह जारी है। पैगंबर इमाम हुसैन को याद करते हुए 29 जुलाई को शहर में ताजिया व सवारियां निकलेंगी। इसकी तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं। अपनी मन्नतों के साथ रात में एक बार फिर शहर के लोग जियारत के लिए जुटेंगे। बिलासपुर में पहली बार ताजिया 1924 में निकली थी, इसके बाद से यहां लगातार परंपरा निभाई जा रही है। ताजियों की संख्या में भले ही खास बढ़ोतरी नहीं हुई लेकिन सवारियां पहले के मुकाबले 3 गुना बढ़कर अब 40 हो गई हैं।

मोहर्रम के खिदमतगार व शांति समिति के वरिष्ठ सदस्य फिरोज कुरैशी व हबीब मेनन ने बताया कि मोहर्रम की 9वीं व 10वीं तारीख को शहर में ताजिया व सवारी निकालने की परंपरा अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में करीब 10 से 12 सवारियां ही निकलती थी लेकिन लोगों की आस्था बढ़ती गई और अब करीब 40 सवारियां शहर के अलग-अलग हिस्सों से निकलती थी।

इन सवारियों के लिए पहले जूनी लाइन में मरकज बनाया गया था लेकिन अब तारबाहर में मरकज बन गया है और सभी सवारियां यहां पहुंचती हैं। 29 जुलाई की रात एकबार फिर पूरा शहर सवारियों व ताजियों की जियारत के लिए जुटेगा। सवारियां अपने इमामबाड़े से निकलकर मदार शाह बाबा की दरगाह पुलिस मैदान और बावली कुआं पहुंचकर जियारत करेंगे। वहीं कौमी एकता का परिचय देने सभी धर्मों के लोग लंगर व शरबत का आयोजन करने की तैयारी में जुटे हुए हैं।

उसकी देन कमेटी द्वारा आयोजित तकरीर के पांचवें दिन मौलाना अदनान अशरफी साहब ने कहा कि इमाम हुसैन ने करबला में इस्लामी हक और बातिल से जंग करके अपने नाना पैगम्बरे हजरत मोहम्मद के इस्लाम को बचा लिया। उन्होंने बताया कि यजीद के खलीफा का एलान करने के बाद इमाम हुसैन मदीने शरीफ और मक्का शरीफ से कर्बला की ओर अपने काफिले को लेकर रवाना हो गए। वहीं कूफे वालों ने उन्हें खत लिखकर बुलावाया और उनसे गद्दारी की । यजीद अपने षडयंत्र से कूफे का हाकिम ओबेदुल्ला साद को बना कर भेज दिया। जो गैर मजहबी वंश का रहा और अहले बैत की मोहब्बत करने वालों से भारी नफरत करता था।

ओबेदुल्ला ने पहले कूफे वालों को धन और अपने फरेब से अहले बैत वालों के खिलाफ किया। मौलाना अदनान साहब ने कहा कि इमाम हुसैन से बगावत करने वाले कोई गैर नहीं थे सभी मुस्लिम ही रहे लेकिन अहले बैत और उनके नाना पैगम्बर मोहम्मद साहब के विरोधी रहे। मोहर्रम के अहम 7वें दिन बुधवार को सुबह से रात तक फातिहा, दरूद खानी, मिलाद, यादे हुसैन की गूंज जारी रहेगी। रमजानी बाबा हाल तालापारा और मेमन जमात खाने मे मिलाद ए शोहदा ए कर्बला होगी।

तारबाहर, चिंगराजपारा, अपोलो रोड चांटीडीह, तालापारा, खपरगज, राजेन्द्र नगर, चांटापारा, मदार शाह बाबा पुलिस मैदान एवं बावली कुआं में यादे हुसैन का माहौल बना रहेगा। अकीदतमंद हबीब मेमन ने बताया कि कि शांति समिति में तय अनुसार सभी आयोजन स्थलों की सफाई व्यवस्था नगर निगम द्वारा कराई जा रही है और पुलिस प्रशासन से भी कौमी एकता के प्रतीक शहर में शांति व्यवस्था कायम रखने पूरा अमला मुस्तैद रहेगा । आजादी के बाद से जूनीलाइन, खपरगंज, मसानगंज, चांटापारा, कुदुदंड, चुचुहियापारा, न्यू कॉलोनी, शनिचरी पड़ाव से फकीरों की ताजिया निकलती रही।

इसमें से मसानगंज में तैयार होने वाली बताशे की ताजिया व जूनीलाइन में हाजी वसीम भाई की अखाड़े के साथ निकलने वाली ताजिया हमेशा आकर्षण का केंद्र रही। बताया जाता है कि आजादी से पहले 6 जगहों पर ताजिया निकलती थी। इसमें मुख्य रूप से खपरगंज, मसानगंज, झोपड़ापारा, चुचुहियापारा, लोको कॉलोनी और चांटापारा शामिल हैं। इनके अलावा चोरभट्ठी से भी ताजिया लेकर लोग शहर पहुंचते थे। उस समय पर लाइट की व्यवस्था नहीं होती थी। इसलिए लोग मशाल और लालटेन लेकर शहर पहुंचते थे।

शहर के हर हिस्से से निकल रहीं सवारियां इमामबाड़ों से पिटारे उठ चुके हैं और शहर के हर हिस्से सवारियां निकल रही हैं। शुरुआती दौर में ईदगाह की खूनी सवारी, तालापारा में नाले-ए-हैदर, जूनीलाइन में गफूर व इब्राहिम मुजावर की सवारी, चांटापारा में पंजा साहेब, जूना बिलासपुर से बशीर बद्र, बंग्ला यार्ड से अमृतलाल, जरहाभाठा से शेख लतीफ व झिंगू मियां समेत करीब 12 सवारियां निकलती थीं। अब इनकी संख्या 40 हो गई है। इनमें प्रमुख रूप से विक्की बाबा, अल्बर्ट मसीह, मुनीर खां उमरिया वाले, शेख जलील जरहाभाठा, पितांबर विश्वकर्मा चिंगराजपारा, संतोष यादव अपोलो रोड, तुलसी भाई बापू उपनगर, ठाकुर भाई विद्यानगर, सोनू सिद्धू टिकरापारा समेत अन्य शामिल हैं।

 

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