समाधान शिविर या दिखावे का शोर? आम जनता को राहत कम, आफत ज्यादा!
आजकल प्रदेश भर में ‘समाधान शिविरों’ की धूम है। शासन-प्रशासन का दावा है कि ये शिविर आम जनता की समस्याओं का मौके पर ही त्वरित निपटारा करने के लिए लगाए जा रहे हैं। लेकिन धरातल की हकीकत इन दावों से कोसों दूर नजर आती है। तीखी धूप और 42 से 45 डिग्री के खौलते तापमान के बीच आयोजित हो रहे ये शिविर अब जन-सुविधा से ज्यादा जनता और कर्मचारियों के लिए आफत बनते जा रहे हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि इन समाधान शिविरों का असली मकसद क्या है और इसकी आड़ में क्या खेल चल रहा है।
1. आम जनता की नजर में ‘हीरो’ बनने का प्रयास?
क्या समाधान शिविर वाकई आमजन की भलाई के लिए हैं या यह सिर्फ जनता की नजर में ‘हीरो’ बनने की राजनीतिक कवायद है? अक्सर इन शिविरों का माहौल एक थियेटर जैसा होता है, जहां बड़े-बड़े जनप्रतिनिधि और आला अधिकारी मंच पर बैठते हैं। शासन की नकारात्मक छवि को रातों-रात सकारात्मक में बदलने का पूरा प्रयास किया जाता है। भरे मंच से अधिकारियों को डांट-फटकार लगाई जाती है, ताकि जनता तालियां बजाए और नेताओं की ‘सिंघम’ वाली छवि चमके। लेकिन क्या इस डांट-फटकार से व्यवस्था सुधरती है?
2. UPSC की कठिन पढ़ाई… क्या इसी दिन के लिए?
एक बड़ा और गंभीर सवाल देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उठता है। क्या देश के सबसे कठिन UPSC और लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को पास करने वाले, साल भर धूप-छांव, उतार-चढ़ाव और हर परिस्थिति को संभालने वाले ज्ञानी और परिश्रमी अधिकारियों की पढ़ाई इसी दिन के लिए है? क्या जनप्रतिनिधियों को इन शिविरों का सिर्फ इसलिए इंतजार रहता है कि वे पढ़े-लिखे अधिकारियों को आम जनता के सामने बेइज्जत कर सकें? जब मंचों से गाली-गलौज, थप्पड़ या अपमान की खबरें आती हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा दाग लगाती हैं।
साल भर से जिन समस्याओं का निराकरण सरकारी तंत्र नहीं कर पाया, उसकी जिम्मेदारी पूरे सिस्टम की है, न कि केवल एक अधिकारी को सरेआम जलील करके खानापूर्ति करने की।
3. बिना बजट के भव्य इंतजाम: आखिर किसकी जेब हो रही खाली?
एक तरफ सरकार इन शिविरों के लिए बड़े-बड़े निर्देश जारी करती है, लेकिन सबसे बड़ा रहस्य इसकी ‘फंडिंग’ को लेकर है। समाधान शिविरों में टेंट, लाउडस्पीकर, खान-पान, और अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए जलपान व भोजन की वीआईपी व्यवस्था की जाती है। सवाल यह है कि बिना किसी विशेष सरकारी आबंटन (Budget Allocation) के इन भारी-भरकम खर्चों का वहन कौन कर रहा है?
पर्दे के पीछे का सच:
आखिरकार इस व्यवस्था का खर्च स्थानीय व्यापारियों, छोटे कर्मचारियों या फिर उस विभाग के मढ़े मढ़ दिया जाता हैजो सीधे तौर पर ग्रामीणों से जुडा है। यानी ‘समाधान’ के नाम पर किसी न किसी की जेब का कटना तय है।
4. आंकड़ों का मायाजाल:
केवल ‘पेंशन, राशन और आवास’ पर सिमटा समाधान
अगर अब तक प्रदेश भर में मिले आवेदनों और उनके निराकरण के आंकड़ों को देखें, तो ये बेहद चौकाने वाले होंगे।
‘सकारात्मक निराकरण’ के नाम पर केवल प्रधानमंत्री आवास, वृद्धावस्था पेंशन और राशन कार्ड जैसी बुनियादी फाइलों को आगे बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा जो बड़ी और जटिल शिकायतें हैं (जैसे भूमि विवाद, भ्रष्टाचार, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मामले), वे आज भी फाइलों में ‘पेंडिंग’ ही पड़ी हैं। त्वरित समाधान के नाम पर केवल आंकड़ों की बाजीगरी की जा रही है।
5. राहत कम, आफत ज्यादा:
शारीरिक, आर्थिक और मानसिक पीड़ा इस भीषण गर्मी में जहां पारा 45 डिग्री छू रहा है, वहां ग्रामीणों को अपने काम-धंधे छोड़कर मिलों दूर से शिविर स्थल तक आना पड़ता है।
आर्थिक संकट:
अपनी ही समस्या के समाधान की गुहार लगाने के लिए एक गरीब ग्रामीण को किराए-भाड़े और खाने-पीने में 150 से 200 रुपये तक खुद की जेब से खर्च करने पड़ते हैं।
स्वास्थ्य का कोई आकलन नहीं:
इस चिलचिलाती धूप में घंटों लाइन में खड़े रहने के कारण कई ग्रामीणों और निचले स्तर के कर्मचारियों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। लू की चपेट में आने पर इलाज का खर्च भी उन्हें स्वयं ही उठाना पड़ता है, जिसका सरकार के पास कोई आकलन या मुआवजा नहीं है।
सत्ता की सीटें पिघलेंगी या दिल?
समाधान शिविरों के इस पूरे तमाशे में परेशान केवल आम जनमानस और जमीनी कर्मचारी हो रहे हैं। हानि जनता के समय और पैसे की हो रही है, जबकि लाभ केवल कागजी वाहवाही लूटने वाले नेताओं को मिल रहा है।
शासन को यदि वाकई जनता की चिंता है, तो उसे दिखावे के इन ‘शोलों’ से बाहर निकलकर व्यवस्था में सुधार करना होगा। तहसील और ब्लॉक कार्यालयों को इतना मजबूत बनाना होगा कि लोगों को अपने हक के लिए किसी शिविर का इंतजार न करना पड़े।
इस भीषण गर्मी में आयोजित हो रहे ये शिविर कितने कामयाब होंगे, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन जनता की यह मानसिक और शारीरिक पीड़ा आने वाले समय में सत्ता की कितनी सीटें पिघलाएगी, इसका फैसला भी वक्त के हाथ में ही है।
शासन को अब जनता की इस सुलगती हुई समस्या पर गंभीरता से ध्यान देना होगा, वरना ‘समाधान’ शब्द सिर्फ एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा।









