आज मोहिनी एकादशी है. वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को मोहिनी एकादशी कहा जाता है. मान्यता है कि एकादशी तिथि सभी पापों को हर लेने वाली होती है. जो व्यक्ति आज के दिन व्रत रखता है, वह पातक समूह, मोहजाल आदि से छुटकारा पा लेता है. मोहिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. हिंदू धर्म के अनुसार, एकादशी का महत्व बहुत अधिक बताया गया है. साल में लगभग 24 एकादशी आती है, क्योंकि एक महीने में दो एकादशी पड़ती है. इस दिन विष्णु भगवान की पूजा और व्रत पूरे विधि-विधान से करने से कई तरह के लाभ मिलते हैं. विष्णु जी की कृपा सदा बनी रहती है. आपको सभी दुख, कष्टों, पापों से मक्ति मिलती है. मोक्ष की प्राप्ति होती है. हालांकि, मन में ये भी सवाल उठता है कि आखिर मोहिनी एकादशी का नाम ये क्यों पड़ा? आइए जानते हैं इसके पीछे की दिलचस्प पौराणिक कथा.
क्यों पड़ा नाम मोहिनी एकादशी?
भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा कहते हैं कि मोहिनी एकादशी के दिन ही विष्णु भगवान ने मोहिनी अवतार धारण किया था. मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद जब अमृत के लिए असुर और देवों में सहमति नहीं बनी तब श्री हरि ने मोहिनी अवतार लेकर देवों को अमृत पान कराया था. इसके बाद देवासुर संग्राम समाप्त हो गया था. कहा जाता है कि जब देवासुर संग्राम हुआ था तब असुरों ने देवताओं को स्वर्ग से भगाकर वहां अपना अधिकार जमा लिया था.
इसी के पश्चात विष्णु जी ने सभी देवताओं को समुद्र मंथन की सलाह दी थी. इंद्र ने असुरों के राजा बलि से मिलने के बाद समुद्र मंथन की योजना बनाई थी. समुद्र मंथन के दौरान 14 अनमोल रत्न उत्पन्न हुए. जब अमृत कलश लेकर धन्वंतरी वैद्य सामने आए तो दोबारा से देवों और असुरों में लड़ाई और बहस छिड़ गई. इसे देखकर भगवान विष्णु ने मोहिनी का अवतार धारण कर लिया.
असुरों और दानवों को अमृत पान कराने के लिए उन्हें अलग-अलग बिठाया. दोनों पक्षों में जब सहमति हुई तो विष्णु जी ने अपने मोहिनी रूप का ऐसा जादू बिखेरा कि सभी असुर उनके रूप-सौंदर्य को देखकर सम्मोहित हो गए. इसके बाद विष्णु जी ने सभी देवताओं को अमृत पिलाया और उन्हें अमर कर दिया. उसके बाद से देवासुर संग्राम का भी अंत हो गया.









