आपने आसमान में कभी न कभी टूटता हुआ तारा ज़रूर देखा होगा. बहुत से लोग टूटते हुए तारे को देखकर मन की मुराद मांगते हैं. हमारे यहां मान्यता चली आ रही है कि टूटता तारा देखने पर जो मनोकामना की जाती है, वह आसानी से पूरी हो जाती है. ये अन्धविश्वास आज का नहीं बल्कि सदियों पुराना है. टूटता तारा देखना वास्तव में बहुत दुर्लभ होता है. इसी कारण से जो लोग इसे देखते हैं, वे अपने आप को सौभाग्यशाली मानते हैं, लेकिन क्या सच में टूटता तारा देखने से कोई शुभ काम होता है? या किसी प्रकार की इच्छा पूरी होती है. भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ पंडित केंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं. टूटे हुए तारों के विषय में कुछ रोचक बातें.
टूटते तारे को लेकर प्राचीन मान्यताएं
1. प्राचीन समय में लोग रात के समय तारों को देखकर दिशाओं का निर्धारण किया करते थे और इसी से कई प्रकार की भविष्यवाणी भी करते थे. प्राचीन लोगों के अनुसार टूटता हुआ तारा देखने से व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आता है.
2. टूटते हुए तारे को देखना सदैव अच्छा हो ऐसा नहीं कहा जा सकता. बहुत से लोग टूटे हुए तारों से अपनी इच्छाएं मांगने को अशुभ भी मानते हैं. प्राचीन काल में अलग-अलग संस्कृति के लोग तारों को दिशा सूचक के रूप में इस्तेमाल करते थे.
3. प्राचीन समय में लोग तारों को देखकर फसल की भविष्यवाणी भी किया करते थे. कुछ लोगों का मानना है कि टूटता हुआ तारा देवताओं, शुद्धिकरण और ब्रम्हांड से जुड़े हुए राज बताता है.
4. प्राचीन समय में कुछ लोगों का ये भी मानना था कि टूटता हुआ तारा वे नई आत्माएं हैं, जो जन्म लेने के लिए पृथ्वी पर आसमान से आ रही हैं. जबकि कुछ अन्य लोग यह भी मानते थे कि ये वे मृत आत्माएं हैं जो हमें याद दिलाती है कि वे अभी भी यहां पर हैं.
टूटते हुए तारे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
टूटता हुआ तारा आसमान में उड़ता हुआ दिखाई देता है, लेकिन असल में ये तारा नहीं होता. टूटता हुआ तारा वास्तव में आकाश में चट्टान या धूल का एक छोटा सा टुकड़ा होता है जो अंतरिक्ष से आकर पृथ्वी के वायुमंडल से टकरा जाता है. जब ये चट्टान पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो घर्षण के कारण जलने लगती है. इस कारण एक जबरजस्त चमक पैदा होती है. असल में टूटते तारें वही होते हैं जिन्हें खगोलशास्त्री उल्का कहते हैं. अधिकांश उल्का पिंड पृथ्वी के वायुमंडल में जलकर खत्म हो जाते हैं और ज़मीन तक नहीं पहुंच पाते, लेकिन कभी-कभी कुछ उल्का पिंड इतने बड़े होते हैं, कि वे पृथ्वी के वायुमंडल में घर्षण के दौरान पूरा नहीं जल पाते और पृथ्वी की सतह तक पहुंच जाते हैं. तब इसे उल्का पिंड कहा जाता है.










