रायपुर। छत्तीसगढ़ शासन वन विभाग एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा 2016 में चयनीत वन क्षेत्रपालों को सहायक वन संरक्षक के पद पर पदोन्नति संबंधी डी.पी.सी. की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन प्रक्रियागत जो त्रुटियां सामने आ रही है उसे लेकर छत्तीसगढ़ तहलका के संपादक रिजवी के द्वारा आपत्ति दर्ज कराते हुए राज्यपाल महोदय-राजभवन, सचिव- छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग, रायपुर, प्रमुख सचिव- वन विभाग छत्तीसगढ़ शासन, प्रधान मुख्य वन संरक्षक- वन बल प्रमुख रायपुर व अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक को ज्ञापन सौंपा है साथ ही उक्त विषय को लेकर न्यायालय के संज्ञान में लाने हेतु प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।
डी.पी.सी. प्रक्रिया को लेकर रिजवी ने जताई आपत्ति

ज्ञापन में कहा गया है कि वर्ष 2016-17 में भर्ती पर आए वन क्षेत्रपालों के द्वारा भर्ती के पश्चात तत्काल प्रशिक्षण में न जाकर एक वर्ष पश्चात दो वर्ष के प्रशिक्षण पर गए तथा वहां से आने के पश्चात निर्धारित सर्किल की कोई भी प्रशिक्षण नहीं की गई। इस प्रकार वर्ष 2016-17 में भर्ती हुए वन क्षेत्रपालों की कार्य अवधि तीन से चार वर्ष ही हुई तथा इनके द्वारा छह वर्ष का कार्यालयीन कार्य नहीं किया गया परन्तु इनकी भर्ती अवधि से प्रशिक्षण अवधि को जोड़ते हुए छ: वर्ष की अवधी मानी जा रही है। जबकि इनके पास अभी रेंज अफसर का अनुभव ही नहीं आया है। इनकी भर्ती मूलरूप से रेंज अफसर के पद पर संचालित करने के लिए हुई थी अभी पद में भर्ती नहीं हो पाई है और इन्हें प्रमोशन दिया जा रहा है। वन सेवा के द्वारा परिक्षेत्र अधिकारी वन क्षेत्रपाल की भर्ती का औचित्य ही क्या निकला ? अगर इन्हें समय से पूर्व ही प्रमोशन देना था तो उनते ही पैमाने पर भर्ती की जानी थी। जबकि इनके द्वारा वन परिक्षेत्र अधिकारी के रूप में लंबे समय तक कार्य ही नहीं किया गया है, तो प्रमोशन को भर्ती अवधि से कैसे एस.डी.ओ. माना जा रहा है। जबकि इन्हें वानिकी कार्यों का अनुभव इत्यादि अत्यंत ही कम है ऐसे में सहायक वन संरक्षक पद धारित कर किस तरह से कार्य संपादित करेंगे?
चूंकि वन क्षेत्रपालों के पद पर प्रशिक्षण अवधि (2-3 वर्ष) को छोड़कर कार्यभारित किये हुए पांच वर्ष की अवधि हुई है जिसे पूर्णत: उपवन क्षेत्रपाल पद का कर्मचारी क्षेत्रपाल पद पर पदोन्नत होता है। रेंजर से सहायक वन संरक्षक के पदोन्नति के लिए सेवा नियम में कार्य अवधि से छ: वर्ष पूर्ण होने का प्रावधान है। लेकिन जिन वन क्षेत्रपालों का चयन वर्ष 2016-17 में हुआ है तथा दो-तीन वर्ष प्रशिक्षण में रहे हैं, इस तरह इनकी कार्यअवधि केवल तीन-चार वर्ष ही मानी जावेगी। वर्ष 2016-17 में पदस्थ हुए क्षेत्रपालों के प्रशिक्षण वर्ष को उनकी कार्यअवधि में न जोड़ा जाए तथा प्रशिक्षण तिथि दो या तीन वर्ष पूर्ण होने के पश्चात छ: वर्ष पूर्ण हो चुके हो उन्हें पदोन्नति दिया जाना उचित होगा।

ज्ञापन में कहा गया है कि भारत सरकार के वन मंत्रालय के राजपत्र में जारी की गई अधिसूचना 2003 के अंतर्गत वन संरक्षण अधिनियम 1980 का 69 की धारा 4 की उपधारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए तथा वन संरक्षण नियम 1981 को रद्द करते हुए पहले किए गए कार्यों या किये जाने वाले कार्यों को छोड़कर केन्द्र सरकार नियम बनाती है- जिसके तहत वन क्षेत्रपाल से सहायक वन संरक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए सेवा नियमों में कार्य अवधि से छ: वर्ष पूर्ण होने पर पदोन्नति का प्रावधान है। लेकिन जिन वन क्षेत्रपालों का चयन 2016-17 में हुआ है तथा दो वर्ष प्रशिक्षण में रहे हैं इस तरह उनकी कार्य अवधि मात्र चार वर्ष ही मानी जाएगी। पदोन्नति में प्रशिक्षण वर्ष को जोड़ा जाना अन्याय पूर्ण माना जावेगा। होना यह चाहिए कि जिन लोगों के प्रशिक्षण तिथि दो या तीन वर्ष पूर्ण होने के पश्चात छ: वर्ष हो चुकी है उन्हें पदोन्नति का लाभ मिलना ही न्याय संगत होगा।
भारत के राजपत्र 2003 के अनुसार समस्त नियम एवं शर्तों का पालन करते हुए एवं छत्तीसगढ़ शासन के पदोन्नति नियम के अनुसार वर्तमान में पदस्थ क्षेत्रपालों के हितों को देखते हुए किसी भी कर्मचारी का अहित न करते हुए वर्तमान में संबंधित वन क्षेत्रपालों को पदोन्नति देने संबंधी चल रही डी.पी.सी प्रक्रिया को स्थगित किया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि जिन वन क्षेत्रपालों के पदोन्नति के लिए डी.पी.सी. की जा रही है उनमें से कुछ के विरूद्ध भ्रष्टाचार, शासकीय कार्य में अनियमितता की शिकायत उच्च विभाग को प्राप्त हुई है। जिसकी जांच के लिए कमेटी भी गठित की गई है, तथा जांच अभी लंबित है। शासन द्वारा प्रक्रियागत त्रुटियों के चलते डी.पी.सी. की प्रक्रिया जारी रही तो शिकायतकर्ता श्री रिजवी द्वारा मामले को न्यायालय के संज्ञान में लाने हेतु कार्यवाही की जा सकती है।







