हिंदू धर्म में गुरु-शिष्य परंपरा का बहुत महत्व है. पुरातन काल से ही यह परंपरा चली आ रही है. गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता है. गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व गुरुजनों को ही समर्पित है. पौराणिक कथाओं के मुताबिक, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को हुआ था. इस वजह से इस वजह से इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. इसे व्यास जयंती या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं. वेदव्यास जी ने महाकाव्य महाभारत की रचना की थी.
बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का बहुत महत्व है. मान्यता है कि इसी दिन महात्मा बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था. इस कारण से गुरु पूर्णिमा का दिन बौद्ध धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण है. हिंदू धर्म के अनुयायी गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरुजनों का आशीर्वाद लेते हैं. आइए आज हम आपको प्रसिद्ध गुरुजनों के कहे कुछ अमृतवचन बताते हैं.
गुरु की महिमा को लेकर कबीरदास जी ने कहा है कि- गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय अर्थात संत कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु और गोविंद जब दोनों एक साथ खड़े हों तो उन दोनों में से सबसे पहले हमें अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही गोविंद के पास जानें का मार्ग बताया है.
संत रविदास जी कहते हैं कि रैदास जन्म के कारणै, होत न कोई नीच। नर को नीच करि डारि हैं, औछे करम की कीच।।अर्थात व्यक्ति पद या जन्म से बड़ा या छोटा नहीं होता है, बल्कि वह गुणों या कर्मों से बड़ा या छोटा होता है.
सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव जी कहते हैं कि अहंकार से ही मानवता का अंत हो जाता है. किसी को कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिये, बल्कि हृदय में सेवा भाव रखकर जीवन व्यतीत करना चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि आप जैसा भी बीज बोयेंगे, उसका फल आपको देर-सबेर जरूर मिलेगा. इसलिए व्यक्ति को कर्म बहुत सोच-समझकर करने चाहिए.
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर जी कहते हैं कि हर जीवित प्राणी के प्रति दयाभाव ही अहिंसा है. घृणा से मनुष्य का विनाश ही होता है. सभी जीवित प्राणियों के प्रति सम्मान का भाव होना ही वास्तव में अहिंसा है. उन्होंने शांति और आत्मनियंत्रण को ही अहिंसा माना है.
आदिगुरु शंकराचार्य ने लोगों को सत्य के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हुए कहा है कि धन, रिश्तों, लोगों, और दोस्तों या अपनी जवानी पर कभी गर्व न करें. ये सभी चीजें पल भर में छीन ली जाती हैं. शंकराचार्य जी ने कहा है कि इस मायावी संसार को त्याग कर परमात्मा को जानो और उन्हें प्राप्त करो.










