हिंदू धर्म में अपरा एकादशी महत्वपूर्ण स्थान रखती है. हिंदू पंचांग के अनुसार जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष अपरा एकादशी का व्रत 15 मई 2023 को रखा जाएगा।अपरा एकादशी को भारतवर्ष के क्षेत्रों में अचला एकादशी के रूप में भी जाना जाता है इस दिन श्रीहरी के निमित्त व्रत और पूजन करने से गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है.हिंदू धर्म शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है.हिंदू धर्म में यह एकादशी हर तरह के पापों को मिटाने में सक्षम मानी गई है. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ उनके पांचवे अवतार वामन ऋषि की पूजा की जाती है.भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु विशेषज्ञ पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं क्यों मनाई जाती है अपरा एकादशी और इसकी पौराणिक कथा के बारे में.
भगवान कृष्ण ने बताई अपरा एकादशी की कथा
एक समय में युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का महत्व बताने का निवेदन किया. तब भगवान कृष्ण ने अपरा एकादशी व्रत को करने से प्रेत योनि, ब्रह्म हत्या आदि से मुक्ति मिलती है, इस बारे में बताया. भगवान कृष्ण ने पौराणिक कथा का वर्णन किया. जिसके अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा हुआ करता था. वहीं उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर और अधर्मी था. वह अपने बड़े भाई महीध्वज से घृणा और द्वेष करता था.
राज्य पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए एक रात उसने अपने बड़े भाई की हत्या कर दी, और उसकी लाश को जंगल में पीपल के नीचे गाड़ दिया. राजा महीध्वज अकाल मृत्यु के कारण प्रेत योनि में प्रेत आत्मा बनकर उस पीपल के पेड़ पर रहने लगे. एक बार उस रास्ते से धौम्य ऋषि निकल रहे थे. उन्होंने राजा को प्रेत बने हुए देख लिया और अपनी माया से उसके बारे में सब कुछ पता कर लिया. ऋषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया.
राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने अपरा एकादशी व्रत रखा था, और श्री हरि विष्णु से राजा के लिए कामना की थी. इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई. राजा बहुत खुश हुआ और महर्षि को धन्यवाद देता हुआ स्वर्ग लोक में चला गया.










