इनके खिलाफ बोलना मुख्यमंत्री और वन मंत्री का अपमान माना जाता है
अंचल के ग्रामीण तो ग्रामीण, ठेकेदार तो ठेकेदार, इनके अधीनस्थ वनकर्मी व अधिकारी भी परेशान
आईएफएस दिव्या गौतम, शमा फ़ारुखी, सलमा फ़ारुखी और बहुत जल्द आईएफएस अवार्ड लेने वाली एसीएफ मोना माहेश्वरी एक ही राशि अर्थात छत्तीसगढ़ी कहावत में कहें तो एक ही चट्टे-बट्टे के अधिकारी हैं, इन अधिकारियों का वन विभाग में आना ही इत्तेफाक नही हैं इनकी कार्य करने की शैली एक है, इनका अधीनस्थों के साथ व्यवहार दुव्र्यवहार सब एक जैसा है, विभाग में आए ज्यादा समय नहीं होने के बावजूद विभाग में इनका डंका बजने लगा, इनके कार्यप्रणाली एक जैसी है, ये खबरों में भी बने रहने में भी एक जैसे हैं, इनकी राजनीतिक एवं प्रशासनिक पहुंच भी बहुत है. दिव्या गौतम तो नियुक्ति दिनांक से गृह शहर में ही पोस्टिंग कराकर विगत 8 वर्षों से वहां जमें रहकर अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक पहुंच दिखा दी, इसके अलावा विभाग में आने के बाद नए किर्तीमान गढ़े गए, पर उनके खिलाफ कभी भी कोई कार्यवाही न होना उनके शासन व प्रशासनिक पकड़ को प्रदर्शित करता है।
इसी प्रकार दोनों बहनों शमा और सलमा फ़ारूक़ी की भी यही हालत रही है, इन्होंने तो बड़े से बड़ा किर्तिमान खड़े किए हैं, द्वय आईएफस ने अपने एसीएफ के ट्रेनिंग में ही लोगों में पहचान बना लिया था। भले ही वो पहचान थोड़ी भ्रष्टाचार में लिप्त रहने की रही हो, अगर आप जानना चाह रहे है कि ये किस तरह सम्भव है कि कोई आईएफएस या एसीएफ अधिकारी रेंजर या एसडीओ के ट्रेनिंग के दौरान भ्रष्टाचार को अंजाम दे सकता है, पर यह सही है, विभाग में आने के बाद द्वय आईएफएस बहनों के द्वारा बहुत से किर्तिमान बनाए ये बताने की जरूरत नही है क्योंकि ये सभी समाचार पत्रों व सोसाल मीडिया से लोगो को मालूम हैं। द्वय आईएफएस बहनों की एसीएफ रहने के दौरान राजनांदगांव में पोस्टिंग के दौरान रात रात भर लोगों के साथ गाडियों में घूमना व आरा-मशीनो में दबाव बनाने इत्यादि घटनाओं को समाचारों मैं बहुत स्थान मिलता था। एसीएफ मोना माहेश्वरी एसडीओ दुर्ग के पोस्टिंग से ही वे विवादों में रहीं, चाहे वे आरामिल मालिकों को परेशान करने या छोटे फुटकर फर्नीचर मार्ट वालो को परेशान करने की हो या हरे कहुवा वृक्षों की अवैध कटाई कर अवैध परिवहन करने वालों से अवैध वसूली की बात हो ये सब स्थानों में वे नंबर वन रहतीं हैं क्योंकि ये ही रेंजर हैं, ये ही एसडीओ हैं और डमी डीएफओ के चलते डीएफओ के कार्य भी यही फाइनल करतीं हैं सिर्फ हस्ताक्षर डीएफओ के होते हैं, इन अवधियों में विभागीय कार्यो में भ्रष्टाचार आम है, विभागीय एवं आम-जनों की माने तो इनके संबंध मुख्यमंत्री के नजदीकी पीए आशीष वर्मा से मधुर होने के कारण पिछले पीसीसीएफ श्री चतुर्वेदी एवं वर्तमान प्रभारी पीसीसीएफ श्री राव की भी माजाल नहीं कि वें इनके खिलाफ कोई पत्राचार कर लें, विभाग में आने के इतने कम समय में इनके द्वारा लाखों की नई गाड़ी, भिलाई में नए निर्माणधीन मकान, गृह ग्राम बिटेझार में मकान निर्माण सहित अन्य आय को अर्जित कर लिया गया कि कोई व्यक्ति इतने कम समय में अर्जित करता तो उनके खिलाफ एसीबी या इओडब्लू की कार्यवाही हो जाती पर मुख्यमंत्री के पीए के करीबी होने के फायदे के चलते अभी तक कोई सार्थक कार्यवाही नही हुई है और वे दमदारी से एसडीओ के पद पर बैठी हुई हैं।
कुछ समय पहले दुर्ग वनकर्मियों (दुर्ग-वन कर्मचारी संघ) के द्वारा इनके खिलाफ संयुक्त शिकायत की गई थी पर इनकी दमदारी देखने के लायक रही, वो ऐसा की एसडीओ मैडम और डीएफओ साथ बैठकर शिकायतकर्ताओं को बुलाकर बयान लिया गया वो भी प्रतिपरीक्षण की तरह, जैसा कि तुम ऐसा कैसे लिख या कह दिए, तुम सोच लो, मुझे नही जानते हो क्या, ऐसे में विभागीय कर्मचारियों की हैसियत ही क्या कि वे वर्तमान एडओ के सामने कह पाते कि हाँ आपने मुझे ऐसा कहा या ऐसा करने कहा, क्योंकि डीएफओ एवं एसडीओ ही छोटे कर्मचारियों के लिए माई-बाप होते हैं इसलिए वो मामला खत्म कर दिया गया।
ऐसे बहुत से उदाहरण सामने होने के बावजूद ये अधिकारी अपने दुव्र्यवहार या अशिष्ट आचरण के बावजूद लाभ के पदों में बैठे हैं तो सिर्फ अपने पहुंच के दम पर, द्वय आईएफएस फ़ारूक़ी बहने तो वनमंत्री के रिश्तेदार होने के कारण विवादों में होने के बावजूद डीएफओ की कुर्सी पर जमी बैठी हैं? इसी प्रकार दिव्या गैतम अपने क्षेत्रीयता व नेताओं सहित जातीवाद के प्रभाव के कारण जमीं बैठी हैं? रही मोना माहेश्वरी एसडीओ दुर्ग की तो वे वनमंत्री से भी बड़ी जैक मुख्यमंत्री के पीए वर्मा जी के कारण लगभग पौने तीन वर्ष से जर्मीं बैठीं हैं?









