’80 साल तक पहुंचा तो चमत्‍कार ही होगा’, बीमारी से जूझ रहा ऑस्‍ट्रेलिया का दिग्‍गज क्रिकेटर

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ऑस्‍ट्रेलिया के दिग्‍गज क्रिकेटर और पूर्व कप्‍तान एलेन बॉर्डर (Allan Border) ने खुलासा किया है कि पिछले 7 वर्षों से वे गंभीर पार्किन्‍सन की बीमारी (Parkinson Disease) का सामना कर रहे हैं. डेनिस लिली, रोडनी मॉर्श और ग्रेग चैपल जैसे दिग्‍गजों के संन्‍यास के बाद ऑस्‍ट्रेलियाई टीम को विश्‍व क्रिकेट में पुनर्स्‍थापित करने में अहम योगदान देने वाले 67 वर्षीय बॉर्डर ने लंबे समय तक इस बारे में चुप्‍पी साधे रखने के बाद पार्किन्‍सन की बीमारी के खिलाफ अपने संघर्ष के बारे में खुलासा किया है.

अपनी कप्‍तानी में वर्ष 1987 में ऑस्‍ट्रेलिया को रिलायंस वर्ल्‍डकप चैंपियन बनाने वाले बॉर्डर ने कहा, ‘मैं प्राइवेसी पसंद करने वाला शख्‍स हूं और नहीं चाहता कि लोग मेरे बारे में दुखी महसूस करें.’ दूसरे, ऑस्‍ट्रेलियाई प्‍लेयर्स की तरह क्रिकेट मैदान पर दृढ़ संकल्‍प और टफ अप्रोच दिखने वाले बॉर्डर ने पार्किन्‍सन के खिलाफ अपनी ‘जंग’ को जागरूकता बढ़ाने और इससे मिलती -जुलती चुनौती का सामना कर रहे लोगों की मदद के लिए सबके सामने लाने का फैसला किया है.

टेस्‍ट में 10 हजार से अधिक रन बनाए
56 टेस्‍ट और 273 वनडे मैचों में ऑस्‍ट्रेलिया की ओर से खेले बॉर्डर ने अपनी कप्‍तानी में ऑस्‍ट्रेलिया को उसका पहला वर्ल्‍डकप (1987) जिताने के साथ-साथ तीन एशेज सीरीज में जीत दिलाई थी. बाएं हाथ के इस बेहतरीन बल्‍लेबाज के नाम टेस्‍ट में 27 शतक दर्ज हैं. टेस्‍ट क्रिकेट में उन्‍होंने 50.56 के औसत से 11174 रन बनाए जबकि वनडे में 30.62 के औसत से 6524 रन. टेस्‍ट क्रिकेट में 39 और वनडे में 73 विकेट भी उनके नाम पर दर्ज हैं.

एक तरह का मूवमेंट डिसऑर्डर है पार्किन्‍सन
क्रिकेट से संन्‍यास लेने के बाद बॉर्डर ने लंबे अरसे तक कमेंटरी बॉक्‍स की शोभा बढ़ाई. उन्‍हें सीधे-सपाट अंदाज में अपनी बात रखने के लिए जाना जाता था. ऑस्‍ट्रेलिया के पूर्व कप्‍तान ने कहा, ‘फिलहाल मुझे कोई डर नहीं है.मैं इस समय 68 वर्ष का हूं. अगर 80 वर्ष की उम्र तक पहुंच गया तो यह चमत्‍कार ही होगा. मेरा एक दोस्‍त फिजीशियन है, उससे चर्चा के दौरान जब मैंने 80 वर्ष की उम्र का जिक्र किया तो उसने जवाब दिया, ‘वास्‍तव में यह चमत्‍कार ही होगा.’ पार्किन्‍सन की बात करें तो एक तरह का मूवमेंट डिसऑर्डर है, जिसमें हाथ या पैर से दिमाग में पहुंचने वाली नसें काम करना बंद कर देती हैं. आनुवंशिक और पर्यावरण विषमताओं की वजह से ऐसा होता हे. यह बीमारी शरीर में धीरे-धीरे होती है, इसलिए इसके लक्षण को पहचानना कई बार बेहद मुश्किल होता है.

 

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