देश में डी-लिस्टिंग कानून की मांग

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छत्तीसगढ़ में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। RSS समर्थित जनजाति सुरक्षा मंच ने तय किया है कि यदि आरक्षित सीट पर धर्म बदल चुके नेता को टिकट मिला तो उसका विरोध किया जाएगा। बीजेपी का एक घोषित प्रत्याशी इनके विरोध का शिकार हो सकता है।

दरअसल रायपुर में जनजाति सुरक्षा मंच ने दो दिन तक राष्ट्रीय बैठक की। डी-लिस्टिंग सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। इसे लेकर जनजाति सुरक्षा मंच ने संसद घेरने तक की रणनीति तैयार की है। आने वाले तीन से चार महीनों में छत्तीसगढ़ समेत देश के तमाम उन सभी राज्यों में धर्मांतरण के मुद्दे को उठाएंगे, जहां चुनाव होने हैं।

क्या है डी-लिस्टिंग

डी-लिस्टिंग को आसान शब्दों में समझिए कि ऐसे आदिवासी जिन्होंने किसी कारण से ईसाई या इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। अपनी पूजा पद्धति और मान्यताओं को बदल लिया, मगर ST कैटिगरी के आरक्षण का पूरा लाभ ले रहे हैं। उन्हें आरक्षण की लिस्ट से हटाने की मांग ही डी-लिस्टिंग है।

जनजाति वर्ग के अधिकारों का हनन

जनजाति सुरक्षा मंच के अखिल भारतीय सहसंयोजक डॉ. राज किशोर हंसदा का कहना है कि छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत लोग हैं। जिनकी वजह से जनजाति वर्ग के अधिकारों का हनन हो रहा है, जो सुविधा आदिवासियों को मिलनी चाहिए वह धर्म बदल चुके लोग हासिल कर रहे हैं। हम इसी का विरोध कर रहे हैं।

बैठक में क्या-क्या तय हुआ

ऐसे व्यक्ति जो मूलधर्म, संस्कृति, परंपरा और रूढ़ियों को छोड़ चुके हैं, उन्हें जनजाति सूची से बाहर किया जाए।
जानकारी मिली है कि विधानसभा चुनाव के लिए ST सीट से धर्मांतरित व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया जा सकता है। इसका हम विरोध करेंगे।
दिसंबर 2023 तक महाराष्ट्र, झारखंड, तमिलनाडु, कर्नाटक, बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल मुख्य रैलियां होंगी।
अगर संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन कर डी-लिस्टिंग कानून नहीं बनाया जाता है तो राष्ट्र भर की 705 अनुसूचित जनजातियां, संसद का घेराव करेंगी।
देशभर में ग्रामीण स्तर तक संगठन की पहुंच को बढ़ाया जाएगा। गांव की सड़क से राष्ट्र की संसद तक संघर्ष थीम पर अभियान चलेगा।
छत्तीसगढ़ पर क्या पड़ेगा असर

चुनाव में उस प्रत्याशी का विरोध किया जाएगा जो ताल्लुक तो आदिवासी वर्ग से रखता है, मगर अपनी धार्मिक मान्यताओं को बदल चुका है। गांव-गांव पहुंचकर आदिवासियों से इन प्रत्याशियों को नहीं चुनने की अपील करेंगे। ऐसे उम्मीदवारों को सियासी नुकसान होना तय है। इस तरह की रणनीति पहली बार चुनाव से ठीक पहले प्रदेश में सामने आई है।

लुंड्रा से प्रबोध मिंज हैं बीजेपी प्रत्याशी

बीजेपी ने लुंड्रा विधानसभा से प्रबोध मिंज को प्रत्याशी बनाया है। सर्व हिंदू समाज की पदाधिकारी पूर्णाहूति भगत ने कहा कि मिंज ईसाई हैं। हम डी-लिस्टिंग की मांग कर रहे हैं। लुंड्रा से ऐसे प्रत्याशी नहीं चलेंगे। ऐसे नेताओं की बड़ी तादाद भाजपा और कांग्रेस दोनों में है। प्रदेश की 90 विधानसभा सीटों में से 39 आरक्षित हैं। जिसमें से 29 जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। जिस पर जनजाति मोर्चा का खास फोकस है।

क्या आदिवासी सियासी असर पैदा कर सकते हैं ?

इस सवाल का जवाब भानुप्रतापपुर उपचुनाव के नतीजों में दिखा था। आरक्षण विधेयक अटकने के मसले पर आदिवासी समुदाय ने बीजेपी और कांग्रेस से खुद को अलग किया था। रिटायर्ड आईपीएस अकबर कोर्राम को उपचुनाव के मैदान में उतरा गया। अकबर दूसरे नंबर पर रहे थे। जीत कांग्रेस को मिली थी।

50 हजार गांवों में 7 लाख आदिवासियों से संपर्क

डॉ. राज किशोर हंसदा ने बताया कि जनजाति सुरक्षा मंच 2006 से लगातार धर्मांतरित व्यक्तियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाने (डी-लिस्टिंग) के लिए पूरे देश में आंदोलन कर रहा है। यह मंच अब तक 221 जिलों और 8 राज्यों में प्रांत स्तर की रैली कर चुका है। लगभग 50 हजार गांवों में संपर्क किया गया। रैलियों में 7 लाख से ज्यादा आदिवासी शामिल हुए।

देश की सियासत पर भी पड़ेगा असर

दिसंबर महीने में राष्ट्र की 705 अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक प्रमुख दिल्ली पहुंचेंगे और संसद का घेराव करेंगे। राष्ट्रीय स्तर पर यह बड़ा विरोध प्रदर्शन होगा। केंद्र सरकार से डी-लिस्टिंग कानून लागू करने की मांग करेंगे। ऐसे में हजारों अफसर, नेता जो धर्म बदल चुके हैं और ST कैटेगरी के आरक्षण का पूरा फायदा उठा रहे हैं, वो सभी संकट में पड़ सकते हैं।

 

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