तहलका पत्रिका ने जिले के आखरी छोर तक जाकर जाना ग्रामीणों की पीड़ा
जिला में वर्ष 2025 में ग्राम पंचायत सरपंच (ग्राम पंचायत प्रतिनिधि) के पद के लिए शांतिपूर्ण चुनाव पूर्ण कराया गया था,जिसमें अनेकों ग्राम पंचायत में पूर्व सरपंच चुनाव हार चुके हैं और नव निर्वाचित हुए सरपंचों को ग्राम पंचायत की जनता ने अपने गांव के विकास के लिए चुना, तथा माननीय प्रधानमंत्री महोदय जी की मंशा रही की आदिवासी ग्रामीणों को शासन की हर योजना का पूरा पूरा लाभ मिले ।
परन्तु बालोद जिले के बहुत से पंचायतों में विशेषकर जनपद पंचायत डौडी एवं डौडी लोहारा के अनेको ग्राम पंचायत में पूर्व सरपंच द्वारा नव निर्वाचित हुए सरपंच को प्रभार के साथ साथ पंचायत के दस्तावेज, शेष बची राशि, व भुगतान की गई राशि का विवरण नही दिया जा रहा है नये सरपंचों को प्रभार नही मिलने के कारण शुरुआती दौर से ही परेशानी उठानी पड रही है।
अगर पंचायती कार्यो का विशलेषण करे तो स्तिथि बड़ी चौकाने वाली हैं।
ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंचो को सी.सी. रोड,सी.सी. नाली, सामुदायिक भवन, मंगल भवन, जिम स्थापना ,टीन शेड निर्माण हेतु अग्रिम राशि के रूप में 2 .5 लाख,3.25 लाख, 5 लाख, 7.25, 10 लाख अग्रिम राशि प्रदाय किया गया है, और सरपंच द्वारा किसी वेंडर को प्रदाय कर दिया जाता है, और वह काम नहीं कर रहा है,इस प्रकार से पंचायत के काम ठप्प पड़े हुए हैं। वेंडर पर दबाव कैसे बनाया जाए,या,पूर्व सरपंच कब पैसा जमा करेगा,या,कब काम कराएगा ये भगवान भरोसे है।
आज की तिथि में शासन के आदेश यह भी है कि 50 प्रतिशत राशि जैसे ही सीईओ के खाता मे आता है ,सरपंच के मांग अनुसार पूरी राशि पंचायत के खाता में ट्रांसफर कर दी जाती है,और वह सीधे वेंडर के नाम से चेक काट देता है,और इस प्रकार सारा खेल होते रहता है,जबकि सीईओ को चाहिए कि कार्य के प्रकृति अनुसार ही पंचायत के खाता में आवश्यकतानुसार राशि ट्रांसफर करे या शासन/प्रशासन ऐसी कोई नीति अपनाए कि भोले भाले आदिवासी सरपंच ” वेंडर” और राजनीति से प्रेरित व्यक्ति के चक्रव्यूह में फंसकर गुलामी या मूक दर्शक बन बैठे हैं और ग्रामीणों के निगाह में सबसे बड़ा अपराधी,भ्रष्टाचारी होता है” यह उस सरपंच के विवशता भी है और मजबूरी भी।
सरपंचों को सहयोग करने की आवश्यकता है ना कि दहशत में डालने की, अज्ञानता के कारण भी अधिकारों से वंचित हो जाता है,कई जगह तो सचिव के ताने बाने,नियम के हवाले से मौन हो जाते हैं और सचिव ही पांच साल गोल गोल घुमाते रहते हैं ,अधिकांश जगह यही हालात है,कुछ जगह सरपंच के सजगता,शासन के सहयोग से गांव में विकास के बेहतर परिणाम है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता।
देश के पंचायत राज व्यवस्था से ग्रामीणों के विकास संभव है,परन्तु डौंडी ब्लाक में राजनीति/शासन/प्रशासन के डंडे चुस्त है और सरपंच सुस्त है,वेंडर खिलाड़ी है और सरपंच मोहरा,वेंडर पैसे लेकर ब्याज कमा रहा है,रोलिंग कर रहा है जब पैसे आ जाते हैं तब एक लंबे समय बाद उस काम को अंजाम दिया जाता है,गांव वाले भी इस इंतजार में रहते हैं की काम अब होगा कब होगा,तब होगा इस प्रकार बेचारे भोले भाले ग्रामीण मूक दर्शक बने देखते रहते हैं और देख रहे हैं।
शासन के आला अफरसो का भी दायित्व है की
वह केवल यह कहकर/देखकर संज्ञान में लेकर कार्यवाही न की ये आदिवासी हैं। बल्कि सब का साथ सब का विकास की नीति अपनानी चाहिए तभी कही जाकर ग्रामीण क्षेत्रो में विकास भी होगा साथ ही साथ देश में जिले का नाम भी रौशन होगा।









